ईशावास्योपनिषद भाग 1,2 | Ishavasya Upanishad Parts 1 & 2

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पुस्तक का एक मशीनी अंश

जो ईशन (शासन) करे उसे ईट् कहते है उसका तृतीयान्त रूप शा’ है । सबका ईशन करनेवाला परमेश्वर परमात्मा है । वही सब जीवोंका आस्मा होकर अंतर था- रूपसे सबका ईशन करता है।

उस अपने स्वरुपभूत आत्मा ईशसे सब बास्य-आच्छादन करने योग्य है।क्या [आच्छादन करने योग्य है] ! यह सब जो कुछ जगती अर्थात् पूधिवीमें जगत् (स्थावर-जंगम प्राणि वर्ग) है यह सब अपने आत्मा

ईश्वर से–अन्तर्यामिरूपसे यह सब कुछ मैं ही हूं–ऐसा जानकर अपने परमार्थसत्यखरूप परमात्मासे यह सम्पूर्ण मिथ्याभूत चशचर आच्टादन करने योग्य है । जिस प्रकार चन्दन और अगल अादिकी,

जल आदिक सम्बन्धसे गलिपन आदिके कारण उत्पन्न औपाधिक दुर्गन्धि उन ( ) के खरूपको विसनेसे उनके पारमार्थिक गन्धरी आष्टादित हो जाती है, उसी प्रकार अपने आमा में आरोपित सामाविक कर्नव

भोक्तृत्व आदि क्षणोपाला देतरूप जगत् जगतीमें यानी गृधिपीमें- ‘जगथाम् यह शब्द [स्वावर- अंगम सभाका] उपक्षाण कराने होनेरी–इस परमार्थ सत्यरूप आमाको मापनासे नामरूप और कर्ममय

सारा ही रिकारजात परित्यक्त हो जाता है ।इस प्रकार के चर ढी चरा- चर जगत्का आमा है-ऐसी मापनासे युक्त है, उसका पुमादि तीनी एपणाओके यागने ही अधिकार है-पर्में नही । उसके एक अर्थात् गसे धमाका

पालन करा त्यागा आ अपना मरा हुआ पुत्र या सेवक, अपने सम्बन का अभाव हो जाने के कारण अपना पाउन नहीं करता। अतः पागसे यही इस श्रुतिका अर्थ ह- भोग यानी पालन कर ।

इस प्रकार एपणाओसे रहित होकर तू गर्द अर्थात् धन-विषयक आकांक्षा न कर । किसीके धनकी अर्थात् अपने या पराये किसीके भी धनकी इच्छा न कर । यहाँ ‘सित्’ यह अर्थरहित निपात है ।

अपया आकांक्षा न कर, क्योंकि धन भला किसका है ?-तीन तो किसीका भी नहीं है जो उसकी इच्छा की जाय-ऐसा आक्षेपसूचक अर्थ भी हो सकता है। यह सब आत्मा डी है-इस प्रकार ईश्वरभावनासे यह सभी है ।

लेखक शंकरभाष्य-Shankarbhashya
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 645
Pdf साइज़39.1 MB
Categoryधार्मिक(Religious)

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