परमार्थ सूत्र संग्रह | Parmarth Sutra Sangrah

परमार्थ सूत्र संग्रह | Parmarth Sutra Sangrah Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

२५-जिस समय बालकके फोड़ेकी चीर-फाड़ होती हैं उस समय वह अपनी माताकी गोदमें सुखसे बैठा रहता है, जरा भी घबड़ाता नहीं। वह रोता हुआ भी इस बातको जानता है कि मेरी स्नेहमयी जननी

कभी स्वप्रमें भी मेरा अहित नहीं कर सकती। उसका प्रत्येक विधान मेरे लिये सदा मङ्गलमय ही होता है। इसी प्रकार भक्त नि:शंक होकर विश्वासपूर्वक भगवान्के चरणोंमें पड़ा रहता है।

२६-हम तो प्रभुके बालक हैं। मा बालकके दोषोंपर ध्यान नहीं देती। उसके हृदयमें बालकके लिये अपार प्यार रहता है। प्रभु यदि हमारे दोषोंका खयाल करें तो हमारा कहीं पता ही न लगे।

२७-हमें वे चाहे जैसे रखें और चाहे जहाँ रखें उनकी स्मृति अटल बनी रहनी चाहिये। उनकी राजीमें ही अपनी राजी, उनके सुख में ही अपना सुख मानना चाहिये। प्रभु यदि हमें नरकमें रखना चाहें

तो हमें वैकुण्ठकी ओर ताकना भी नहीं चाहिये, बल्कि नरकमें वास करने में ही परम आनन्द मानना चाहिये।२८-सब प्रकारसे प्रभुके शरण हो जानेपर फिर उनसे इच्छा या याचना करना नहीं बन सकता।

जब प्रभु हमारे और हम प्रभुके हो गये तो फिर बाकी क्या रहा!२९-यह सारा संसार उस नटवरका क्रीड़ास्थल है, प्रभु स्वयं इसमें बड़ी ही निपुणताके साथ नाट्य कर रहे हैं, उनके समान चतुर खिलाड़ी

दूसरा कोई भी नहीं है, यह जो कुछ हो रहा है सब उन्हीका खेल है। उनके सिवा कोई भी ऐसा अद्भुत खेल नहीं कर सकता। इस प्रकार इस संसारकी सम्पूर्ण क्रियाओंको भगवान्की लीला समझकर वह

शरणागत भक्त क्षण-क्षणमें प्रसन्न होता रहता है और पग-पगपर प्रभुको दयाका दर्शन करता रहता है।३०-शरणागत भक्त स्वयं तो उद्धाररूप हैं ही और जगत्का उद्धार करनेवाले हैं, ऐसे महापुरुषोंके दर्शन, स्पर्श, भाषण और चिन्तनसे ह

लेखक जयदयाल गोयन्दका-Jaidayal Goindka
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 161
Pdf साइज़48.9 MB
Categoryसाहित्य(Literature)

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