कबीर के दोहे | Kabir Ke Dohe

कबीर के दोहे | Kabir Ke Dohe Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

आँखे भी गवां दीं।वह संजीवन बूटी कहीं नहीं मिल रही, जिससे कि जीवन यह जीवन बन जाय,व्यर्थता बदल जाय सार्थकता में |सुखिया सब संसार है, खावै और सौंवे | दुखिया दास कबीर है, जागे अरू रौवे ||

भावार्थ – सारा ही संसार सुखी दीख रहा है, अपने आपमें मस्त है वह,खूब खाता है और खूब सुनता है । दुखिया तो यह कबीरदास है, जो आठों पहर जागता है और रोता ही रहता है । [धन्य है ऐसा जागना, ओर ऐसा रोना किस काम का,

इसके आगे खूब खाना और खूब सोना जा कारणि में ढूँढती, सनमुख मिलिया आइ । घन मैली पिव ऊजला, लागि न सकी पाइ ।। भावार्थ – जीवात्मा कहती है -जिस कारण में उसे इतने दिनों से ढूँढ रही थी,

वह सहज ही मिल गया, सामने ही तो था | पर उसके पैरों को कैसे पकडू ?मैं तो मैली हैं, और मेरा पियतम कितना उजला ॐ सो, संकोच हो रहा है । जब में था तव हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहि । सब अधिपारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माहि ।।

भावार्थ – जबतक यह मानता था कि मैं हूँ’, सक्तक मेरे सामने हरि नहीं थे । और अब हरि आ प्रगटे, तो में नहीं रहा । अँधेरा और उजेला एकसाथ, एक ही समय, कैसे रह सकते हैं ? फिर वह दीपक तो अन्तर में ही था ।

देवल माहें देहुरी, तिल जे है । माहे पाती भाई जल, माहें ।। भावार्थ – मन्दिर के अन्दर ही देहरी है एक, विस्तार में दिल के । वहीं पर पते और फूल चढाने को रखे हैं,और भी तो वहीं पर हैं। [में ही मंदिर है, और भी वहीं मौजूद है ।

लेखक कबीर-Kabir
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 91
Pdf साइज़1 MB
Categoryसाहित्य(Literature)

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