जैसा बीज वैसा फल | Jaisa Beej Waisa Fal

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पुस्तक का एक मशीनी अंश

तीर्थयात्राका महत्त्व और परलोकवादकी सत्यता

‘आधुनिक कालमें जन-समुदायका विश्वास तीर्थयात्रा और परलोकवादसे उठता जा रहा है। परंतु यहाँ एक ऐसी घटनाका वर्णन दिया जा रहा है, जो केवल सत्य ही नहीं है

वरं जिसकी साक्षीके रूपमें राजस्थान राज्यके भीलवाड़ा जिलेके कई व्यक्ति आज भी विद्यमान हैं। जिला भीलवाड़ा, तहसील माँडलमें राजपुरा नामक एक ग्राम हैं।

यहाँ ठाकुर श्रौईश्वरसिंहजीका जन्म विक्रमी संवत् १९४१ भाद्रपद कृष्ण ७. को हुआ था। जब इनकी आयु पंद्रह वर्षकी हुई, इन्होंने भी अपने पिताश्रीके साथ सौरभजी (सूकरक्षेत्र), मथुरा, वृन्दावनकी यात्रा की।

यात्रा से लौटते हुए विक्रमी संवत् १९५५ के फाल्गुन शुक्ल ११ को कासगंज (उत्तरप्रदेश) के निकटवाहिनी कालिन्दी नदीमें भी इन्होंने स्नान किया। वहाँ अन्नपूर्णादिवीके दर्शन किये।

पुष्कर होते हुए ये अपने निवास स्थान राजपुरा लौट आये। राजपुरा आनेके दो वर्ष पश्चात् कार्तिक शुक्ल ११ विक्रमी संवत् १९५७ को भीमसिंहकी मृत्यु हो गयी।

मृत्युके उपरान्त शवको दाह संस्कारके लिये श्मशान भूमि ले जानेकी तैयारी शुरू हुई। परंतु मृत्युके दो घंटे पश्चात् भीमसिंहके शवमें पुन: प्राणोंका संचार होना लक्षित हुआ और वे स्वस्थ हो गये।

तभी भीमसिंहने अपने परलोकगमनके समाचार इस तरह वर्णित किये ‘गौरवर्णके चार दूत. जिनके चार चार भुजाएँ थीं, जिनके ललाटपर वेत चन्दनके ऊर्ध्वपुण्डू तिलक थे,

जो बड़े देदीप्यमान प्रतीत हो रहे थे, जिनके चरण पृथ्वीको स्पर्श नहीं करते थे, जिनके दो-दो हाथ ऊपर उठे हुए थे, बड़ी शीघ्रतासे मुझे एक काष्ठके तख्ते पर सुलाकर उत्तरकी तरफ उड़ा ले गये।

काफी दूर जानेके बाद एक विशाल भवन दृष्टिगोचर हुआ दूत मुझे भीतर ले जानेको ही थे कि ऐसा कहा गया-‘इस जीवकी मृत्यु इस समय नहीं है। इसको तो अभी बहुत उम्र बाकी है। इसे शीघ्र ही अपनी देहमें वापस पहुँचा दो।

लेखक Hanuman Prasad
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 165
Pdf साइज़355.7 KB
Categoryसाहित्य(Literature)

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