श्री तारकेश्वरनाथ शिव चालीसा | Tarkeshwarnath Shiv Chalisa PDF

श्री ताडकेश्वरनाथ शिव चालीसा – Tarkeshwarnath Shiv Chalisa Pdf Free Download

ताडकेश्वरनाथ शिव चालीसा

इस संसार में ऐसी कोई शक्ति है जो संसार के पूरे चक्र को चलाती है। ऐसी सभी धर्मों व उनके धर्म ग्रन्थों द्वारा प्रदर्शित होता है।

भारतीय हिन्दू संस्कृति के ग्रंथों वेद, पुराण एवं आध्यात्मिक मतानुसार वो शक्ति पर ब्रह्म निराकार जो एक ज्योति स्वरूप गोल आकार में है उसमें ओम विद्यमान है।

ओम पर चक्राधार बिन्दू है। बिन्दू भी ज्योति स्वरूप है। यही परम ब्रह्म निरंकार के रूप से जाने जाते हैं।

चन्द्रकार बिन्दू वाले ओम के चारों ओर ज्योति का आवरण है अगर ओम के चारों तरफ ज्योति का आवरण एवं ज्योतिस्वरूप चन्द्रकार बिन्दू हट जाये तो ओम का कोई अस्तित्व नहीं रहता।

अगर परम ब्रह्म ज्योति स्वरूप निरंकार के बीच से ओम हट जाये तो परम ब्रह्म के चारों तरफ ज्योति एवं चन्द्राकार ज्योति का कोई अस्तित्व नहीं रहता है। ये दोनों एक-दूसरे के पूरक है। ये यर्थाथ है।’

आदि शक्ति ज्योति द्वारा ही ओम में से त्रिदेव साकार रूप में आये हैं। जो ब्रह्मा, विष्णु, शिव के नाम से जाने जाते हैं। ये तीनों ओम त्रिगुणात्मक स्वरूप है। इन तीनों में शक्तिका समावेश है।

अगर ब्रह्मा में से शक्ति स्वरूप माँ शब्द हटा दिया जाये तो ब्रह्मा का कोई अस्तित्व नहीं रहता है और विष्णु में से वि की मात्रा हटा दी जाये तो विष्णु का कोई अस्तित्व नहीं रहता, अगर शिव में की मात्रा हटा दी जाये तो शिव का कोई अस्तित्व नहीं रहता है। ये एक-दूसरे के पूरक है।

आध्यात्मिक मतानुसार संसार में जीतने भी पुरूष तत्व है वह सब ओम स्वरूप है और जितना भी स्त्री तत्व है वह ज्योतिस्वरूपा है।

परम ब्रह्म निराकार की ज्योति (चैतन्यता) संसार के प्राणी मात्र के शरीर रूपी जड में विद्यमान है। अगर ज्योति (चैतम्यता) शरीर रूपी जड़ से निकल जाती है तो शरीर रूप जड़ समाप्त हो जाता है और अगर शरीर रूपी जड़ नष्ट हो जाये तो ज्योति चैतन्यता नहीं रहेगी। दोनों एक-दूसरे के पूरक है।

श्री ताड़केश्वर की वन्दना

सेवा पूजा बन्दगी सबही आपके हाथ, मैं तो कछ जानु नहीं आप जानो भोलेनाथ । शिव समान दाता नहीं विपति बिढारण हार, लज्जा सबकी राखियो जग के पालन हार ॥

उमापति महादेव की जय ।

शिव शक्ति माँ शैलजा विन्द वसनी नाम, शक्ति के संयोग से पूर्ण हो सब काज। सिंह चढ़े दुर्गा मिली गरूड़ चढ़े भगवान, बैल चढे बाबा मिले निश्चित हो कल्याण ॥

उमापति महादेव की जय ।

ओंमकार में सार है। है अनन्द फलसार, श्री ताड़केश्वरनाथ का साँचा है दरबार। दाता के दरबार में माँगे सब कर जोड़, देने वाला एक हें माँगे लाख करोड़ ॥

उमापति महादेव की जय ।

कोई कहे कैलाशपति कोई गिरिजानाथ, मैं तो श्री ताड़केश्वरनाथ कहूँ रखियों सिर पर हाथ। | वासी आप कैलाश के बसो हिरदय में आय, पुष्प जल स्वीकार करे हिरदय कमल मुस्काय ॥

उमापति महादेव की जय ।

म्हारी सेवा भोला स्वीकारो। सेवा में कोई भूल हुई,गुनाह माफ करो म्हारो मैं सेवक हूँ भोला थारी, सेवा में कोई भूल हुई,विधि विधान, ज्ञान नहीं मोहे सेवा कर लीनी। मन्त्र, तन्त्र, बिन, भोग लगा थाकी आरती भी कीनी ॥

बांका चरणा में ही ध्यान राखण्यो, अरजी सुणी म्हारी।पार लगायी जब धाम बुलाओ, भोला भंडारी ॥ मुने एक थाको ही सहारा । सेवा में कोई भूल हुई काई अरज करू थाने सब जाणी त्रिपुरारी।

बात जायली थाकी है ” शिव-शक्ति । महतारी ।।मन चायो फल थे दे डारो। सेवा में कोई भूल हुई , * शिव की शृंगार स्तुति कैसो अद्भुत रूप धर्यो है जी, बाबा बागम्बर धारी। “शिव-शक्ति”

मणी मोत्या रो मुकुट सजायो जी, केसर तिलक त्रिपुंड लगायो जी। कैसी शोभित हो रही है या देखो चन्द्रवी न्यारी ।।कैसो अद्भुत रूप धर्यो. गल में नागराज फणधारी जी, रुद्राक्ष की माला है भारी जी।

पन्ना मोती, जड़ित ये कुण्डल चाकी कर्ण छवि प्यारी ।कैसो अद्भुत रूप धरयो. कर में त्रिशुल, डमरू सोहे जी. गणपति कार्तिक जी मन मोहे जी! रहती संग में सदा भवानी जी बाबा भोला भण्डारी

कैसी अद्भुत रूप धरा दरशण काया जो भी आवजी पथ सागर से वो तीरजा जी। में भी शाण पडयो ह घाट शिव तारक जो तिमुरारो।।कसो अदभुत काप धरओ.वस्त्र खाल बाभम्यर सोहें। छवि को देखि नागमुनि मौहें ॥

मैना मातु कि हवे दुलारी। वाम अंग सोहत छवि न्यारी॥ कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन् क्षयकारी । मन्दि गणेश सो तह कैसे सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥ कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥

लेखक गुलाब जोशी-Gulab Joshi
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 50
Pdf साइज़7 MB
Categoryकाव्य(Poetry)

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