प्रेम और प्रेमी | Prem Aur Premi

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पुस्तक का एक मशीनी अंश

सच्चा प्रेम त्यागमें है

एक प्रश्न है कि किसीके शरीरमें बड़ी पीड़ा हो रही है। उसे बिच्छू काट लिया है या अन्य प्रकारकी कोई वेदना है। उस वेदनामें भगवान्‌का मंगलमय विधान है और उसमें भगवान्‌को सुख होता है।

इसे हम सुख मानें, यह कैसे समझा जाय? इसीपर कुछ विचार-विनिमय करना है। यह सारा जगत् स्थिर है मनपर और मनमें जिसके जैसा भाव है उसी प्रकारकी उसको अनुभूति होती है। यह समझने की बात है।

भीष्म पितामह शर शैव्यापर पड़े हैं। उनके रोम-रोममें बाण विद्ध है। उनके शरीरमें दो अंगुल भी जगह नहीं बची है जहाँ वाण न विधा हो। शरीरको बेधकर बाण नीचे जमीनपर टिक गये।

परन्तु सिरमें बाण नहीं लगे थे। उन्हीं बाणोंकी शैय्यापर भीष्मजी सो रहे हैं। उनका सिर लटक रहा है। भीष्मजीने कहा- अरे। सिर तकलीफ पा रहा है। तकिया दो। वहाँपर कौरव और पाण्डव सभी थे, जो थे ।

अन्य लोग भी थे। सभी दांडे कि दादाजीको तकिया दें। कोई बड़ा तकिया लाये, कोई छोटा तकिया लाये, कोई लम्बा तकिया लाये और कोई मसनद लाये। इसपर पितामहने कहा- ‘मुखौं! यहाँसे जाओ।

अर्जुनको बुलाओ।’ जब अर्जुन आये तो उन्होंने कहा बेटा! तकिया दो। फिर अर्जुनने अपने तरकशसे वाण निकाले। वहाँ देखनेवाले लोग आश्चर्य करने लगे कि दादाजी तकिया माँग रहे हैं और यह बाण निकाल रहा है।

यहाँपर कोई लड़ाई थोड़े हो रही है। अर्जुनने तीन बाण निकाले और पितामहके मस्तकपर मारा। वाण सिरसे निकलकर जमीनपर टिक गये। सिरका तकिया हो गया।

इसपर पितामह भीष्मने कहा- ‘बेटा में आशीर्वाद देता हूँ यह कोई सुसंगत बात है क्या? परन्तु इस समय भीष्मजीका मन जो है वह दूसरे तरहका है। उस समय वहाँ जो जरांह थे जिन्हें दुर्योधनने मरहम-पट्टीके लिये।

लेखक हनुमान प्रसाद-Hanuman Prasad
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 168
Pdf साइज़355.7 KB
Categoryप्रेरक(Inspirational)

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