दो महाविभुतियो के प्रसंग: जयदयाल गोयन्दका, हनुमानप्रसाद पोद्दार

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पुस्तक का एक मशीनी अंश

सेठजी श्रीजयदयालजी गोयन्दका

श्रीसेठजीकी सादी वेशभूषा : काशीमें अध्ययन करते समय एक संस्था के द्वारा सम्मानित सज्जनोंकी सूचीमें सेठ श्रीजयदयाल गोयन्दकाका नाम देखा था।

उन्हें ‘भक्तराज’ की उपाधिसे विभूषित किया गया था। मनमें प्रश्न उठा- ये सद्गृहस्थ कौन हैं? कल्पनायें आयीं। शरीरका वर्ण गौर, वस्त्र पीले, ललाटपर तिलक, सामान्य रूपसे जैसे भक्तलोग रहते हैं।

हरिभक्तपारायण संगीतमर्मज्ञ श्रीविष्णुदिगम्बरजीके द्वारा आयोजित ‘गीताज्ञान-यज्ञ’ प्रयागमें जानेपर सेठजीको देखनेका अवसर मिला। अपने मनकी कल्पनायें व्यर्थ गयीं।

रंग साँवला, शरीपर श्वेत बगलबन्दी, साधारण धोती, मारवाड़ी पगड़ी, कानमें मुरकी, एक सेठ मंचपर बैठे हुए थे। हाँ, यहीं गोयन्दकाजी थे। सर्वथा साधारण, देखने में सेठ, सरलताकी मूर्ति, वेशभूषा सरल, चाल-ढाल सीधी-सादी; आश्चर्य हुआ।

उस साधारणमें एक महान् निवास था। मेरा अनुमान है कि उन्होंने ‘भक्तराज’ की उपाधि कभी स्वीकार नहीं की।

भाईजी श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार

श्रीभाईजीसे प्रथम मिलन : ‘कल्याण ‘के तीसरे वर्ष (सन् १९२९) के विशेषांक ‘भक्तांक’ को पढ़कर भाईजीसे मिलनेकी इच्छा हुई। उस समय मनमें कल्पना होती-

भाईजीकी आँखें सर्वदा बंद रहती होंगी, मुखमण्डलसे ज्योति निकलती होगी, गौर वर्ण होगा, सबसे अलग रहते होंगे, न जाने क्या-क्या विशेषताएँ उनमें होंगी। हमसे न जाने कितने दूर होंगे।

मिलनेको उत्कण्ठा इतनी तीव्र हुई कि रुपये-पैसेका ख्याल न करके खाली हाथ जैसे था, वैसे ही चल पड़ा। दोहरीघाट स्टेशनतक रेलसे गया और वहाँसे गोरखपुर करीब २० मील पैदल।

उन दिनों भाईजी गोरखनाथके समीपवाले बगीचेमें रहते थे। पहले मैं गीताप्रेस पहुँचा और वहाँसे पैदल चल कर बगीचे आया। जब मैं वहाँ पहुँचा तो भाईजी वहाँसे प्रेस जा चुके थे।

गोस्वामी श्रीचिम्मनलालजीसे कुछ बातचीत होती रही। ६, ७ घंटे बाद करीब ८ बजे रात्रिको भाईजी प्रेससे लौटे। मुझे देखते ही भाईजीने इस प्रकार मुझे पकड़कर गलेसे लगा लिया,

जैसे में उनका कोई चिर परिचित होऊँ। शान्तिसे बैठ जानेके बाद मैंने पूछा-‘भगवान्में प्रेम कैसे हो?”

लेखक अखंडानन्द स्वामी-Akhandanand Swami
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 150
Pdf साइज़323.2 KB
Categoryआत्मकथा(Biography)

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