व्यक्तिविवेक | Vyakti Viveka

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पुस्तक का एक मशीनी अंश

‘काज्यविशेषः’ के समर्थन में एक युक्ति और दी गई। उसमें कहा गया कि भले ही रसात्मक सन्दर्भ कान्य हो किन्तु जब उसमें उसके वस्तु आदि भवान्तर व्यङ्ग्यों का समावेश हो तब तो वैशिष्टय आ ही जायगा।

इस पर अनुमितिवादी ने उत्तर दिया। वस्तु आदि का अस्तित्व रस से पृथक् नहीं है। वे रस के ही व्यशक विभाबादि अङ्ग है। जिस प्रकार गाय के काले, पीले या श्वेत रङ्ग से उसके गोत्व में कोई वैशिष्टय नहीं

आता ठीक वैसे ही वस्तु या अलङ्कार के वैशिष्टय से रस में भी कोई वैशिष्टय नहीं आता। यदि मान भी लिया जाय तो अन्याप्ति और अतिव्याप्त दोष होंगे।

अव्याप्ति उस शुद्ध रस वाले काव्य में होगी जहाँ वस्तु और अलङ्कार दोनों या उनमें से कोई एक एक ही व्यङ्ग्य या व्यञ्जक न होंगे। अतिव्याप्ति उन ‘सिद्दिपिच्छ’ आदि पहेलियों में होगी

जिनमें अनेक हेतुकल्पनाओं के बाद कोई नीरस वस्तु मात्र व्यङ्गथ होती है। वस्तुतः उनमें काव्यत्व नहीं होता। इस प्रकार रस के ( अन्वय व्यतिरेक) रहने न रहने पर जब काव्यत्व का अस्तित्व अनस्तित्व निर्भर है

तब शुद्ध काव्य के ही लिए ध्वनि का प्रयोग उचित है ऐसा प्रतीत होता है। ‘कुमारसंभव ८६२, ७२; शाकुन्तल ३४, वामनकृत काव्यालंकार सूत्र ५।२।२३ तथा उसमें उद्धृत व्या० महाभाष्य के प्रयोग से ‘शक्यम्’ का प्रयोग शुद्ध है ।

व्याख्यानकार का संकेत इन्हीं संदर्भों की ओर है। ‘शक्यः’ पाठ अवश्य ही किसी ने बदल दिया है।’ध्वनिवादी ने विशिष्ट शब्दार्थ को काव्य मानकर ध्वनि को उसकी आत्मा माना था।

साथ ही ध्वनि के वस्तु, अलङ्कार तथा रस ये तीन भेद माने थे। अनुमितिवादी केवल रस को काव्यक निष्पादक मानता है। और उसी रस को काव्य में ध्वनित्व का निष्पादक। अतः उसकी दृष्टि में सभी काव्य ध्वनि कान्य ही हैं ।

लेखक महिम भट्ट-Mahim Bhatta
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 570
Pdf साइज़52.7 MB
Categoryसाहित्य(Literature)

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