विनोबा की ज्ञान गंगा में | Vinoba Ki Gyan Ganga Me

विनोबा की ज्ञान गंगा में | Vinoba Ki Gyan Ganga Me Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

उन्होंने मुझे वहाँ बाने का निमंत्रण दिया। अवसर मिला तो मैं वहां अवश्य जाऊंगी। छोटी दिल्ली जमशेदपुर मैंने पहली बार देखा है। आज जैसे ही हम लोगों ने इस शहर में प्रवेश किया, छक्ष्मीबाबू बोले, “यह हम छोटी दिल्ली में आ गये।”

दिल्ली के जैसा ही यह सुन्दर और शानदार शहर है, यद्यपि दिल्ली से छोटा है । एक बात में भिन्नता अवश्य है। दूर से ही यहां के कारखानों की धुंएंदार चिमनियां बौर ऊंची दीवारें दीख पड़ती हैं । शहर के बीच एक सुन्दर सरोवर भी है, जो दिल्ली में नहीं । सारे शहर की रचना बड़ी अच्छी है।

जमशेदपुर से हम लोग जब लौट रहे थे तो लक्ष्मीबाबू ने ग्रामोद्योग को दृष्टि में रखते हुए कहा, “हम तो चाहते हैं, यह कारखाने इत्यादि बन्द हो जायं तो अच्छा ।” मैने कहा, “लेकिन रेल के बिना आवागमन की असुविधा तो बहुत होगी।” तो कहने लगे,

“समाज को आज सुविधा नहीं शान्ति चाहिए।” इन बातों से उनकी खादी और ग्रामोद्योग के प्रति निष्ठा पग-पग पर व्यक्त होती है। मोटर में बैठे हुए भी कह रहे थे कि “पराधीन सपनेहुँ सुख नाही” और “स्वाधीन वृत्ति ही खादी है।” पर मैने लक्ष्मी बाबू से कहा कि खादी और मोटर की तो कोई तुलना की नहीं जा सकती ।

गांधीजी ‘बापू’; विनोबा ‘बाबा रास्ते में हमने वह स्कूल देखा, जहां अपनी पदयात्रा में विनोबा ठहरे थे और वहां से बुखार में ही पैदल चलकर गांव तक आये थे । वह १०३ बुखार में भी वहां से चांदील तक चलने को कमर कसे हुए थे,

पर साथी यात्रियों ने बहुत आग्रह किया।एक बात में भिन्नता अवश्य है। दूर से ही यहां के कारखानों की धुंएंदार चिमनियां बौर ऊंची दीवारें दीख पड़ती हैं । शहर के बीच एक सुन्दर सरोवर भी है, जो दिल्ली में नहीं ।

लेखक ज्ञानवती दरबार-Gyanvati Darbar
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 219
Pdf साइज़13.1 MB
Categoryआत्मकथा(Biography)

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