वेदांत स्तोत्र संग्रह | Vedanta Stotra Sangraha

वेदांत स्तोत्र संग्रह | Vedanta Stotra Sangraha Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

भावार्थ-विदेश के मान को, सवेश में प्रशंसा हो, और अपनी सदा भारपरावणता का कितना अभिमान हो कि मुझसे अधिक साचारी दूसरा कोई है ही नहीं,

यह सब होने पर भी यहि गुरुदेवके चरणकमळ मैं निष्कपटभाष ले मन नहीं लगा तो इन सब से कुछ भी काम नहीं ॥ भावार्थ-जिसके चरणकमलों की सेवा पृथ्वीमण्डल के राजा

महाराजा लोग सदा करतेहों ऐसे मनुष्यका इतना बड़ा सम्मान मी निष्फल है यदि श्रीगुरुदेवके चरणों में निष्कपट भावसे मनको नहीं लगाया भावार्थ-मेरा यश दानके प्रताप से सम्पूर्ण दिशाबों में व्याप है

जिसके प्रभावसे संसारके सारे पदार्य मेरे दस्तगत है दिसा समझनेवाले दानशील का दान भी निष्फल है यदि गुरुदेवके चरणोमि निष्कपट मात्र मन नहीं लगाया।॥ॐ॥

भावार्थ-यदि कोई ऐसा जितेन्द्रिय हो कि जिसका चित्त न तो भोग विकास में, न हययोगादि में, न उत्तम बोरों में, न चन्त्रमुखी कामिनी में और न धनवाच्यादिके के संप्रह में असक हुआ

पश ऐसी अनासि होते हुए भी बाद श्रीगुरुदेवके चरणों में निष्कपट बसे मन नहीं लगाया तो उसके जितेन्त्रिपता से कोई लाभ नहीं भावार्थ-यदि कोई पेसा विरणा हो कि जिसकी सनोदषि वन में,

निज परिवारहित घर में, व्यापार में, शारीरके पालनपोषणावि में तथा अमूल्य पदार्थी के संद्रहादि किसी भी कार्य में नहीं लगी परन्तु फिर भी यदि श्रीगुरुदेव के चरणकमलों में उसका मन नहीं लगा,

तो उसका यह वेराज्य विलकुल निरर्थक भावार्थ-यवि श्रीगुरुदेवक चरणकमलों में निषकपदमाव से मन नहीं लगाया गया तो अमूल्य रामों का तथा मुक्तादिक का उपभोग और रात्रि में कोमल्कलैवरा चन्दसुग्

कानिनियों का मलीमकार आहिङ्ञन करना इत्यादि सब प्रकारके सुख निष्फल हैं यदि ्रीसदुकुचरणमें श्रीति नहीं पुण्यात्मा, संन्यासी नूपाति, मचारी तथा गास्थ इस बटकको पाता है, जिसका मन श्रीगुरुदयके को हुए वाक्यों में लगा हुमा

लेखक निरंजन देव सरस्वती-Niranjan Dev Saraswati
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 51
Pdf साइज़6.8 MB
Categoryसाहित्य(Literature)

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