शार्ङ्गधर संहिता | Sharangdhar Samhita PDF In Hindi

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शार्ङ्गधर संहिता – Sharangdhar Samhita Book PDF Free Download

किताब के पुस्तक

रोगके मूल कारण

श्रौषधियोंके प्रभाव और निराकरण

प्रयोजन

ग्रन्थको महिमा

पूर्वखण्डके विषय

मध्यखण्डके विषय

उत्तरखण्डके विषय

ग्रन्थकी संख्या

मानकी परिभाषा

त्रसरेणुका परिमाण

परमाणुका लक्ष्य

मरीचि श्रादिका परिमाण

मंगलाचरण

श्रियं स दद्याद्भवतां पुरारिर्यदंगतेजःप्रसरे भवानी । विराजते निर्मलचन्द्रिकायां महौषधीव ज्वलिता हिमाद्री ॥१॥

जैसे निर्मल चाँदनीमें हिमालय पर्वतकी श्रौषधियों सुशोभित होती हैं, उसी तरह जिनके अर्धाङ्गमें पार्वतीजी विद्यमान हैं, ऐसे श्रीशंकरजी आप लोगोंको श्री ग्रर्थात् मङ्गल, लक्ष्मी या शोभा प्रदान करें ॥ १ ॥

चिकित्सकोंने जिनका तरह-तरइके उपायोंसे बार-चार अनुभव किया है, मैं शार्ङ्ग घर सजनोंको प्रसन्न करनेके लिये उन योगोका एक सुन्दर संग्रह कर रहा हूँ ॥२॥

प्रसिद्धयोगा मुनिभिः प्रयुक्ताश्चिकित्सकैर्ये बहुशोऽनुभूताः । विधीयते शार्ङ्गधरेण तेपां सुमंग्रहः सज्जनरंजनाय ॥२॥

चरक-सुश्रुत आदि प्राचीन मुनियोंने जिनका आविष्कार किया और अच्छे

रोगके मल कारण

हेत्वादिरूपाकृतिसात्म्यजातिभेदैः नमीच्यातुरसर्वरोगान् । चिकित्सितं कर्परहणाख्यं कुर्वीत वैद्यो विधिवत्सुयोगैः ||३||

वैद्यको चाहिगे कि हेतु, पूर्वरूप, रूप, सात्म्य तथा जाति, इन भिन्न-भिन्न उपायोसे पहले रोगको परीक्षा कर ले, तत्र शात्रोक्त विधिके अनुसार अच्छे प्रयोगोंसे कर्पण तथा बृंहण चिकित्सा करे ।

ऐसा न करनेसे दोषका भागी होना पड़ता है। अनुभवी आचार्योंका मत है कि-जिस कारण रोग उपजे, उसे हेतु कहते हैं। रोग उत्पन्न होनेके पहले जो लक्षण दीखें, उनको श्रादिरूप या पूर्वरूप कहते हैं।

रोगोंके उत्पन्न होनेपर तृष्णा, मूर्च्छा, भ्रम, दाह श्रादि जो भी लक्षण दोखते हैं, उनकी प्राकृति संज्ञा है । यदि यौषध तथा श्राहार-विहार रोगके अनु कूल उपयुक्त होता है, तो उसे तात्म्य या उपशय कहते हैं।

बात-पित्तादि दोषोंके दूपित होकर ऊपर-नीचे स्वतन्त्रतापूर्वक विचरनेसे वस्तुतः उत्पन्न ठीक-ठीक ज्ञानको ही जाति या सम्प्राप्ति कहते हैं।

बढ़े हुए बातादि दोषोंको औषधि देकर घटानेकी क्रियाको कर्पूरण चिकित्सा कहते हैं । क्षीण दोपोंको पुष्ट करनेवाली क्रियाको बृंहण चिकित्सा कहते हैं ॥ ३ ॥

कर्पका मान कोलद्वयं च कर्पः स्यात्स प्रोक्तः पाणिमानिका । अक्षः पिचुः पाणितलं किंचित्पाणिञ्च तिन्दुकम् ||२१||

विडालपदकं चैव तथा पोडशिका मता । करमध्यं हंसपदं सुवर्णकवलग्रहम् ||२२||

उदुम्बरं च पर्यायः कर्ष एव निगद्यते । ऊपर कहे हुए कोलसे दो कोलका एक कर्प होता है। पाणिमानिका, यक्ष, पिचु, पाणितल, किंचित्पाणि, तिन्दुक, विडालपदक, नखा, षोडशिका, करमध्य, हंसपद, सुवणं, कवलग्रह तथा उदुम्बर ये तेरह कपके पर्यायवाचक नाम है। वर्तमान समयको तौलोंमें एक कर्षका एक तोला होता है || २१ ॥ २२ ॥

लेखक शार्ङ्गधराचार्य
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 468
PDF साइज़14.7 MB
CategoryHealth
Source/Creditsarchive.org

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