श्री शनि देव चालीसा | Shani Dev Chalisa PDF in Hindi

श्री शनि देव चालीसा, अर्थ सहित – Shani Dev Chalisa PDF Free Download

हिंदू धर्म में शनि देव को दंडाधिकारी माना गया है। सूर्यपुत्र शनिदेव के बारे में लोगों के बीच कई मिथ्य हैं। लेकिन मान्यता है कि भगवान शनिदेव जातकों के केवल उसके अच्छे और बुरे कर्मों का ही फल देते हैं।

शनि देव की पूजा अर्चना करने से जातक के जीवन की कठिनाइयां दूर होती है। शिव पुराण में वर्णित है कि अयोध्या के राजा दशरथ ने शनिदेव को “शनि चालीसा” से प्रसन्न किया था।

शनि चालीसा निम्न है। शनि साढ़ेसाती और शनि महादशा के दौरान ज्योतिषी शनि चालीसा का पाठ करने की सलाह देते हैं।

श्री शनि देव चालीसा हिन्दी अनुवाद सहित

॥दोहा॥

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल।
दीनन के दुःख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥
जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज।
करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥

॥चौपाई॥

जयति जयति शनिदेव दयाला। करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥
चारि भुजा, तनु श्याम विराजै। माथे रतन मुकुट छवि छाजै॥
परम विशाल मनोहर भाला। टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥

कुण्डल श्रवण चमाचम चमके। हिये माल मुक्तन मणि दमके॥
कर में गदा त्रिशूल कुठारा। पल बिच करैं अरिहिं संहारा॥

पिंगल, कृष्णों, छाया, नन्दन। यम, कोणस्थ, रौद्र, दुःख भंजन॥
सौरी, मन्द, शनि, दशनामा। भानु पुत्र पूजहिं सब कामा॥

जा पर प्रभु प्रसन्न है जाहीं। रंकहुं राव करैं क्षण माहीं॥
पर्वतहू तृण होई निहारत। तृणहू को पर्वत करि डारत॥

राज मिलत वन रामहिं दीन्हो। कैकेइहुं की मति हरि लीन्हो॥
बनहूं में मृग कपट दिखाई। मातु जानकी गई चतुराई॥

लखनहिं शक्ति विकल करिडारा। मचिगा दल में हाहाकारा॥
रावण की गति मति बौराई। रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई॥

दियो कीट करि कंचन लंका। बजि बजरंग बीर की डंका॥
नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा। चित्र मयूर निगलि गै हारा॥

हार नौलाखा लाग्यो चोरी। हाथ पैर डरवायो तोरी॥
भारी दशा निकृष्ट दिखायो। तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो॥
विनय राग दीपक महँ कीन्हों। तब प्रसन्न प्रभु हवै सुख दीन्हों॥

हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी। आपहुं भरे डोम घर पानी॥
तैसे नल पर दशा सिरानी। भूंजी-मीन कूद गई पानी॥

श्री शंकरहि गहयो जब जाई। पार्वती को सती कराई॥
तनिक विलोकत ही करि रीसा। नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा॥

पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी। बची द्रोपदी होति उधारी॥
कौरव के भी गति मति मारयो। युद्ध महाभारत करि डारयो॥

रवि कहं मुख महं धरि तत्काला। लेकर कूदि परयो पाताला॥
शेष देव-लखि विनती लाई। रवि को मुख ते दियो छुड़ई॥

वाहन प्रभु के सात सुजाना। दिग्ज हय गर्दभ मृग स्वाना॥
जम्बुक सिंह आदि नख धारी। सो फल ज्योतिष कहत पुकारी॥

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं। हय ते सुख सम्पत्ति उपजावै॥
गर्दभ हानि करै बहु काजा। सिंह सिद्धकर राज समाजा॥

जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै। मृग दे कष्ट प्राण संहारै॥
जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी। चोरी आदि होय डर भारी॥

तैसहि चारि चरण यह नामा। स्वर्ण लौह चाँजी अरु तामा॥
लौह चरण पर जब प्रभु आवैं। धन जन सम्पत्ति नष्ट करावै॥
समता ताम्र रजत शुभकारी। स्वर्ण सर्वसुख मंगल कारी॥

जो यह शनि चरित्र नित गावै। कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै॥
अदभुत नाथ दिखावैं लीला। करैं शत्रु के नशि बलि ढीला॥

जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई। विधिवत शनि ग्रह शांति कराई॥
पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत। दीप दान दै बहु सुख पावत॥
कहत राम सुन्दर प्रभु दासा। शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा॥

॥दोहा॥

पाठ शनिश्चर देव को, की हों विमल तैयार।
करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥

अनुवाद(Meaning)

हे माता पार्वती के पुत्र भगवान श्री गणेश, आपकी जय हो। आप कल्याणकारी है, सब पर कृपा करने वाले हैं, दीन लोगों के दुख दुर कर उन्हें खुशहाल करें भगवन। हे भगवान श्री शनिदेव जी आपकी जय हो, हे प्रभु, हमारी प्रार्थना सुनें, हे रविपुत्र हम पर कृपा करें व भक्तजनों की लाज रखें।

हे दयालु शनिदेव महाराज आपकी जय हो, आप सदा भक्तों के रक्षक हैं उनके पालनहार हैं। आप श्याम वर्णीय हैं व आपकी चार भुजाएं हैं। आपके मस्तक पर रतन जड़ित मुकुट आपकी शोभा को बढा रहा है।

आपका बड़ा मस्तक आकर्षक है, आपकी दृष्टि टेढी रहती है ( शनिदेव को यह वरदान प्राप्त हुआ था कि जिस पर भी उनकी दृष्टि पड़ेगी उसका अनिष्ट होगा इसलिए आप हमेशा टेढी दृष्टि से देखते हैं ताकि आपकी सीधी दृष्टि से किसी का अहित न हो)। आपकी भृकुटी भी विकराल दिखाई देती है।

आपके कानों में सोने के कुंडल चमचमा रहे हैं। आपकी छाती पर मोतियों व मणियों का हार आपकी आभा को और भी बढ़ा रहा है। आपके हाथों में गदा, त्रिशूल व कुठार हैं, जिनसे आप पल भर में शत्रुओं का संहार करते हैं।

पिंगल, कृष्ण, छाया नंदन, यम, कोणस्थ, रौद्र, दु:ख भंजन, सौरी, मंद, शनि ये आपके दस नाम हैं। हे सूर्यपुत्र आपको सब कार्यों की सफलता के लिए पूजा जाता है।

क्योंकि जिस पर भी आप प्रसन्न होते हैं, कृपालु होते हैं वह क्षण भर में ही रंक से राजा बन जाता है। पहाड़ जैसी समस्या भी उसे घास के तिनके सी लगती है लेकिन जिस पर आप नाराज हो जांए तो छोटी सी समस्या भी पहाड़ बन जाती है।

हे प्रभु आपकी दशा के चलते ही तो राज के बदले भगवान श्री राम को भी वनवास मिला था। आपके प्रभाव से ही केकैयी ने ऐसा बुद्धि हीन निर्णय लिया।

आपकी दशा के चलते ही वन में मायावी मृग के कपट को माता सीता पहचान न सकी और उनका हरण हुआ। उनकी सूझबूझ भी काम नहीं आयी।

आपकी दशा से ही लक्ष्मण के प्राणों पर संकट आन खड़ा हुआ जिससे पूरे दल में हाहाकार मच गया था। आपके प्रभाव से ही रावण ने भी ऐसा बुद्धिहीन कृत्य किया व प्रभु श्री राम से शत्रुता बढाई।

आपकी दृष्टि के कारण बजरंग बलि हनुमान का डंका पूरे विश्व में बजा व लंका तहस-नहस हुई। आपकी नाराजगी के कारण राजा विक्रमादित्य को जंगलों में भटकना पड़ा।

उनके सामने हार को मोर के चित्र ने निगल लिया व उन पर हार चुराने के आरोप लगे। इसी नौलखे हार की चोरी के आरोप में उनके हाथ पैर तुड़वा दिये गये। आपकी दशा के चलते ही विक्रमादित्य को तेली के घर कोल्हू चलाना पड़ा। लेकिन जब दीपक राग में उन्होंनें प्रार्थना की तो आप प्रसन्न हुए व फिर से उन्हें सुख समृद्धि से संपन्न कर दिया।

आपकी दशा पड़ने पर राजा हरिश्चंद्र की स्त्री तक बिक गई, स्वयं को भी डोम के घर पर पानी भरना पड़ा। उसी प्रकार राजा नल व रानी दयमंती को भी कष्ट उठाने पड़े, आपकी दशा के चलते भूनी हुई मछली तक वापस जल में कूद गई और राजा नल को भूखों मरना पड़ा।

भगवान शंकर पर आपकी दशा पड़ी तो माता पार्वती को हवन कुंड में कूदकर अपनी जान देनी पड़ी। आपके कोप के कारण ही भगवान गणेश का सिर धड़ से अलग होकर आकाश में उड़ गया।

पांडवों पर जब आपकी दशा पड़ी तो द्रौपदी वस्त्रहीन होते होते बची। आपकी दशा से कौरवों की मति भी मारी गयी जिसके परिणाम में महाभारत का युद्ध हुआ।

आपकी कुदृष्टि ने तो स्वयं अपने पिता सूर्यदेव को नहीं बख्शा व उन्हें अपने मुख में लेकर आप पाताल लोक में कूद गए। देवताओं की लाख विनती के बाद आपने सूर्यदेव को अपने मुख से आजाद किया।

हे प्रभु आपके सात वाहन हैं। हाथी, घोड़ा, गधा, हिरण, कुत्ता, सियार और शेर जिस वाहन पर बैठकर आप आते हैं उसी प्रकार ज्योतिष आपके फल की गणना करता है।

यदि आप हाथी पर सवार होकर आते हैं घर में लक्ष्मी आती है। यदि घोड़े पर बैठकर आते हैं तो सुख संपत्ति मिलती है। यदि गधा आपकी सवारी हो तो कई प्रकार के कार्यों में अड़चन आती है, वहीं जिसके यहां आप शेर पर सवार होकर आते हैं तो आप समाज में उसका रुतबा बढाते हैं, उसे प्रसिद्धि दिलाते हैं।

वहीं सियार आपकी सवारी हो तो आपकी दशा से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है व यदि हिरण पर आप आते हैं तो शारीरिक व्याधियां लेकर आते हैं जो जानलेवा होती हैं।

हे प्रभु जब भी कुत्ते की सवारी करते हुए आते हैं तो यह किसी बड़ी चोरी की और ईशारा करती है। इसी प्रकार आपके चरण भी सोना, चांदी, तांबा व लोहा आदि चार प्रकार की धातुओं के हैं।

यदि आप लौहे के चरण पर आते हैं तो यह धन, जन या संपत्ति की हानि का संकेतक है। वहीं चांदी व तांबे के चरण पर आते हैं तो यह सामान्यत शुभ होता है, लेकिन जिनके यहां भी आप सोने के चरणों में पधारते हैं, उनके लिये हर लिहाज से सुखदायक व कल्याणकारी होते है।

जो भी इस शनि चरित्र को हर रोज गाएगा उसे आपके कोप का सामना नहीं करना पड़ेगा, आपकी दशा उसे नहीं सताएगी। उस पर भगवान शनिदेव महाराज अपनी अद्भुत लीला दिखाते हैं व उसके शत्रुओं को कमजोर कर देते हैं।

जो कोई भी अच्छे सुयोग्य पंडित को बुलाकार विधि व नियम अनुसार शनि ग्रह को शांत करवाता है। शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष को जल देता है व दिया जलाता है उसे बहुत सुख मिलता है।

प्रभु शनिदेव का दास रामसुंदर भी कहता है कि भगवान शनि के सुमिरन सुख की प्राप्ति होती है व अज्ञानता का अंधेरा मिटकर ज्ञान का प्रकाश होने लगता है।

अर्थ: भगवान शनिदेव के इस पाठ को ‘विमल’ ने तैयार किया है जो भी शनि चालीसा का चालीस दिन तक पाठ करता है शनिदेव की कृपा से वह भवसागर से पार हो जाता है।

शनि देवजी की पूजा विधि

शनि देवता को न्याय का देवता कहा जाता है ऐसी मान्यता है कि वह सभी के कर्मों का फल देते हैं। कोई भी बुरा काम उनसे छिपा नहीं, शनिदेव हर एक बुरे काम का फल मनुष्य को ज़रूर देते हैं।

जो गलती जानकर की गई उसके लिए भी और जो अंजाने में हुई, दोनों ही गलतियों पर शनिदेव अपनी नजर रखते हैं। इसीलिए उनकी पूजा का बहुत महत्व है।

मान्यता है कि अगर पूजा सही तरीके से की जाए तो इससे शनिदेव की असीम कृपा मिलती है और ग्रहों की दशा भी सुधरती है। शनिदेव महाराज की पूजा विधि इस प्रकार है:-

  • हर शनिवार मंदिर में सरसों के तेल का दीया जलाएं। ध्यान रखें कि यह दीया उनकी मूर्ति के आगे नहीं बल्कि मंदिर में रखी उनकी शिला के सामने जलाएं और रखें।
  • अगर आस-पास शनि मंदिर ना हो तो पीपल के पेड़ के आगे तेल का दीया जलाएं। अगर वो भी ना हो तो सरसों का तेल गरीब को दान करें। शनिदेव को तेल के साथ ही तिल, काली उदड़ या कोई काली वस्तु भी भेंट करें।
  • भेंट के बाद शनि मंत्र या फिर शनि चालीसा का जाप करे।
  • शनि पूजा के बाद हनुमान जी की पूजा करें. उनकी मूर्ति पर सिन्दूर लगाएं और केला अर्पित करें।
  • शनिदेव की पूजा के दौरान इस मंत्र का जाप करें: ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नम: ।
लेखक
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 4
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CategoryReligious

शनि देव के 108 नाम – Shani Dev 108 Names in Hindi

  1. शान्त – शांत रहने वाला
  2. सर्वाभीष्टप्रदायिन् – सभी इच्छाओं को पूरा करने वाला
  3. शरण्य – रक्षा करने वाला
  4. सौम्य- नरम स्वभाव वाले
  5. सुरवन्द्य- सबसे पूजनीय
  6. शनैश्चर – धीरे-धीरे चलने वाला
  7. सुरलोकविहारिण् – सुरह्स की दुनिया में भटकने वाले
  8. सुखासनोपविष्ट – घात लगा के बैठने वाले
  9. सुन्दर- बहुत ही सुंदर
  10. घन – बहुत मजबूत
  11. घनरूप – कठोर रूप वाले
  12. घनाभरणधारिण् – लोहे के आभूषण पहनने वाले
  13. घनसारविलेप – कपूर के साथ अभिषेक करने वाले
  14. खद्योत – आकाश की रोशनी
  15. मन्द – धीमी गति वाले
  16. वरेण्य – सबसे उत्कृष्ट
  17. सर्वेश- सारे जगत के देवता
  18. मन्दचेष्ट – धीरे से घूमने वाले
  19. महनीयगुणात्मन् – शानदार गुणों वाला
  20. मर्त्यपावनपद – जिनके चरण पूजनीय हो
  21. महेश – देवो के देव
  22. छायापुत्र – छाया का बेटा
  23. शर्व – पीड़ा देना वेला
  24. शततूणीरधारिण् – सौ तीरों को धारण करने वाले
  25. चरस्थिरस्वभाव – बराबर या व्यवस्थित रूप से चलने वाले
  26. अचञ्चल – कभी ना हिलने वाले
  27. नीलवर्ण – नीले रंग वाले
  28. नित्य – अनन्त एक काल तक रहने वाले
  29. नीलाञ्जननिभ – नीला रोगन में दिखने वाले
  30. नीलाम्बरविभूशण – नीले परिधान में सजने वाले
  31. निश्चल – अटल रहने वाले
  32. वेद्य – सब कुछ जानने वाले
  33. विधिरूप – पवित्र उपदेशों देने वाले
  34. विरोधाधारभूमी – जमीन की बाधाओं का समर्थन करने वाला
  35. भेदास्पदस्वभाव – प्रकृति का पृथक्करण करने वाला
  36. वज्रदेह – वज्र के शरीर वाला
  37. वैराग्यद – वैराग्य के दाता
  38. वीर – अधिक शक्तिशाली
  39. वीतरोगभय – डर और रोगों से मुक्त रहने वाले
  40. विपत्परम्परेश – दुर्भाग्य के देवता
  41. विश्ववन्द्य – सबके द्वारा पूजे जाने वाले
  42. गृध्नवाह – गिद्ध की सवारी करने वाले
  43. गूढ – छुपा हुआ
  44. कूर्माङ्ग – कछुए जैसे शरीर वाले
  45. कुरूपिण् – असाधारण रूप वाले
  46. कुत्सित – तुच्छ रूप वाले
  47. गुणाढ्य – भरपूर गुणों वाला
  48. गोचर – हर क्षेत्र पर नजर रखने वाले
  49. आयुष्यकारण – लम्बा जीवन देने वाला
  50. आपदुद्धर्त्र – दुर्भाग्य को दूर करने वाले
  51. विष्णुभक्त – विष्णु के भक्त
  52. वशिन् – स्व-नियंत्रित करने वाले
  53. अविद्यामूलनाश – अनदेखा करने वालो का नाश करने वाला
  54. विद्याविद्यास्वरूपिण् – ज्ञान करने वाला और अनदेखा करने वाला
  55. विविधागमवेदिन् – कई शास्त्रों का ज्ञान रखने वाले
  56. विधिस्तुत्य – पवित्र मन से पूजा जाने वाला
  57. वन्द्य – पूजनीय
  58. विरूपाक्ष – कई नेत्रों वाला
  59. वरिष्ठ – उत्कृष्ट
  60. गरिष्ठ – आदरणीय देव
  61. वज्राङ्कुशधर – वज्र-अंकुश रखने वाले
  62. वरदाभयहस्त – भय को दूर भगाने वाले
  63. वामन – (बौना ) छोटे कद वाला
  64. ज्येष्ठापत्नीसमेत – जिसकी पत्नी ज्येष्ठ हो
  65. श्रेष्ठ – सबसे उच्च
  66. मितभाषिण् – कम बोलने वाले
  67. कष्टौघनाशकर्त्र – कष्टों को दूर करने वाले
  68. पुष्टिद – सौभाग्य के दाता
  69. स्तुत्य – स्तुति करने योग्य
  70. स्तोत्रगम्य – स्तुति के भजन के माध्यम से लाभ देने वाले
  71. भक्तिवश्य – भक्ति द्वारा वश में आने वाला
  72. अशेषजनवन्द्य – सभी सजीव द्वारा पूजनीय
  73. विशेषफलदायिन् – विशेष फल देने वाले
  74. भानु – तेजस्वी
  75. भानुपुत्र – भानु के पुत्र
  76. भव्य – आकर्षक
  77. पावन – पवित्र
  78. धनुर्मण्डलसंस्था – धनुमंडल में रहने वाले
  79. धनदा – धन के दाता
  80. धनुष्मत् – विशेष आकार वाले
  81. तनुप्रकाशदेह – तन को प्रकाश देने वाले
  82. तामस – ताम गुण वाले
  83. वशीकृतजनेश – सभी मनुष्यों के देवता
  84. पशूनां पति – जानवरों के देवता
  85. खेचर – आसमान में घूमने वाले
  86. घननीलाम्बर – गाढ़ा नीला वस्त्र पहनने वाले
  87. काठिन्यमानस – निष्ठुर स्वभाव वाले
  88. आर्यगणस्तुत्य – आर्य द्वारा पूजे जाने वाले
  89. नीलच्छत्र – नीली छतरी वाले
  90. नित्य – लगातार
  91. निर्गुण – बिना गुण वाले
  92. गुणात्मन् – गुणों से युक्त
  93. निन्द्य – निंदा करने वाले
  94. वन्दनीय – वन्दना करने योग्य
  95. धीर – दृढ़निश्चयी
  96. दिव्यदेह – दिव्य शरीर वाले
  97. दीनार्तिहरण – संकट दूर करने वाले
  98. क्रूर – कठोर स्वभाव वाले
  99. क्रूरचेष्ट – कठोरता से दंड देने वाले
  100. दैन्यनाशकराय – दुख का नाश करने वाला
  101. आर्यजनगण्य – आर्य के लोग
  102. कामक्रोधकर – काम और क्रोध का दाता
  103. कलत्रपुत्रशत्रुत्वकारण – पत्नी और बेटे की दुश्मनी
  104. परिपोषितभक्त – भक्तों द्वारा पोषित
  105. परभीतिहर – डर को दूर करने वाले
  106. भक्तसंघमनोऽभीष्टफलद – भक्तों के मन की इच्छा पूरी करने वाले
  107. निरामय – रोग से दूर रहने वाला
  108. शनि – शांत रहने वाला

शनि चालीसा का पाठ कैसे करना चाहिए?

अधिकतर लोगों के मन में आता है कि शनिदेव की असीम कृपा पाने के लिए पाठ कैसे करे या फिर शनि चालीसा का उच्चारण किस तरह किया जाना चाहिए?

भक्तों चिंता कि कोई जरूरत नही है वैसे तो शनि महाराज अपने नाम के उच्चारण से ही बहुत खुश हो जाते है। यदि आप तब भी शनि महाराज जी कि चालीसा को सही से उच्चारित करना चाहते है तो बेफिक्र रहिये।

सुबह सुबह जब आप सोकर उठते है तब सबसे पहले आपको अपनी दिनचर्या में सबसे पहले शौचालय जाना है वहां से आने के बाद आपको ब्रश करना है, नहाना है और फिर सूर्य महाराज को जल चढ़ाना है।

जल चढ़ाने के बाद आपको शनि चालीसा पढ़ने के लिए जमीन पर एक आसन बिछाना है और शनि महाराज की फोटो रखनी है।

यदि आपके पास शनि महाराज की फोटो नही है तो भी चलेगा, आपको अपने सर पर एक कपड़ा रखना है और श्री शनि चालीसा पाठ शुरू करना है, कोशिश करना जब भी आप शनि चालीसा पढ़े तो आपके आस पास शनि का माहौल हो और आपका फ़ोन आपसे काफी दूर हो।

शनि चालीसा के लाभ:

शनिवार के दिन शनि मंदिर में श्री शनि चालीसा का पूर्ण विश्वास के साथ श्रद्धा पूर्वक पाठ करने से शनि देव से व्यक्ति जिस चीज की कामना करता है मिलने लगती है, उसके सारे कष्ट दूर हो जाते हैं।

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