संत वाणी अंक | Sant Vani Ank

संत वाणी अंक | Sant Vani Ank Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

श्रीमहादजी कहते हैं-हापीमें भी विष्णु, सर्पमें मी विष्णु, जलमें भी विष्णु और अविमें भी भगवान् विष्णु ही हैं । दैत्वपते ! आपमें भी विष्णु और मुझमें भी विष्णु हैं,

विष्णुके बिना दैत्यगणकी भी कोई सत्ता नहीं है । मैं उन्हीं भगवान् निष्णुकी स्तुति करता हूँ, जिन्होंने अनेकों बार चराचर भूतसमुदायके सहित तीनों लोकोंकी रचना की है,

संवर्धन किया है और अपने अंदर लीन भी किया है । वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों । ब्रह्मा भी विष्णुरूप ही हैं , भगवान् शंकर भी उन्हींके रूप है । इन्द्र, वायु, यम और अगि,

प्रकृति आदि चौबीसों तत्व तथा पुरुष नामक पचीसवाँ तत्व गी भगवान् विष्णु ही हैं । पिताकी देहमें, रुरुजीकी देहमें और मेरी अपनी देहमें भी वे ही विराजमान हैं ।

यों जानता हुआ में मरणशील अधम मनुष्यकी स्तुति क्यों करूँ । जिसके द्वारा मोजन करते, शयन करते, सवारीमें, ज्वर थूकते समय, रण और मरणे ‘हरि’ इन शब्दोंका उच्चारण नहीं

आप मुझपर ऐसी कृपा कीजिये कि अकद भावसे आपके चरणकमलोंके आश्रित सेवकोंकी सेवा करने अवसर मुझे अगले जन्म में भी प्राप्त हो । प्राणवल्लभ !

मेर भने आपके मङ्गलमय गुणोंका स्मरण करता रहे, मेरी वाण उन्हींका गान करे और शरीर आपकी सेवामें ही संख्या रहे सर्वसौभाग्यनिधे ! मैं आपको छोड़कर स्वर्ग,

ब्रह्मलोक म मण्डलका साम्राज्य, रसातलका एकछत्र गण्य यीगह सिद्धियाँ- -यहाँलक कि मोक्ष भी नहीं चाहता । जैसे पक्ियो पंखहीन बच्चे अपनी माकी बाट जोहते रहते हैं,

जैसे भूत बछड़े अपनी माका दूध पीनेके लिये आतुर रहते हैं और जै वियोगिनी पत्नी अपने प्रवासी प्रियतनसे मिलनेके लिये उकण्टिर रहती है, वैसे ही कमलनयन !

मेरा मन आपके दर्शन लिये छटटा रहा है। प्रभो ! मैं मुक्ति नहीं चाहता ! कम के फलस्वरूप मुझे बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्कर में भटवन पढ़े, इसकी परवा नहीं,

लेखक हनुमान प्रसाद-Hanuman Prasad
Gita Press
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 724
Pdf साइज़24.7 MB
Categoryधार्मिक(Religious)

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