सामाजिक समस्याए और परिवर्तन | Samajik Samasya Aur Parivartan PDF in Hindi

सामाजिक समस्याए और सामाजिक परिवर्तन | Samajik Samasya aur Samajik Parivartan Book/Pustak PDF Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

सामाजिक समस्या का अर्थ

राव और सेल्जनिक के अनुसार सामाजिक समस्या एक मानवीय सम्बन्ध की समस्या है जो समाज के लिए एक गम्भीर खतरा उत्पन्न करती है अथवा जो व्यक्ति को महत्वपूर्ण आफाक्षाओं की प्राप्ति में बाधाएँ पैदा करती हैं।

पान लेण्डिस के मतानुसार सामाजिक समस्याएँ व्यक्तियों की कल्याण सम्वन्धी अपूर्ण आकाधाएँ हैं।

मेरिन और एल्डिरिन का विचार है कि सामाजिक समस्याएँ तब उत्पन्न होती है जय गतिहीनता के कारण अधिक संख्या में लोग अपनी अपेक्षित सामाजिक भूमिकाओं में कार्य करने में असमर्थ होते हैं।

यद्यपि सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में समस्याएँ पायी जाती है, जैसे आर्थिक क्षेत्र में कृषि उत्पादन बढ़ाने हेतु सिंचाई और साद की समस्या, राजनीतिक क्षेत्र में केन्द्रीय सरकार तथा राज्य गरकारों के सम्बन्धों की समस्या आदि, परन्तु इनको हम सामाजिक समस्या नही मानते।

केवल उन्हीं समस्याओं को सामाजिक समस्याएँ माना जाता है जिनमेसमाज में सामंजस्य सुदृढता व मूल्यों को खतरा होता है। इसी प्रकार व्यक्तिगत समस्या और सामाजिक समस्या में भी अन्तर है।

व्यक्तिगत समस्या एक व्यक्ति के हितो से सम्बन्धित होती है जबकि सामाजिक समस्या पूरे समाज के हितों को प्रभावित करती है।

भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता, बेकारी, निर्धनता, वेश्यावृति अपराध, नशाखोरी, भिक्षावृत्ति, अनुशासनहीनता आदि सामाजिक समस्याएँ हैं जबकि पुत्री के लिए दहेज के रुपये एकत्रित करना एक व्यक्ति की समस्या है।

व्यक्तिगत समस्या के निवारण के लिए प्रयत्न भी व्यक्तिगत होने चाहिए परन्तु सामाजिक समस्या के समाधान के लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता होती है।

लेखक Ram Ahuja
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 261
PDF साइज़6.5 MB
Categoryविषय(Subject)

हाटन मौर मेस्वे के अनुसार सामाजिक समस्या यह स्थिति है जो बहुत से लोगो को अनुचित रूप से प्रभावित करती है और जिसका निवारण सामूहिक क्रिया से ही हो सकता है। इस परिभाषा में चार मुख्य तत्व मिनते हैं-

  1. एक ऐसी स्थिति जो समाज में बहुसंख्यक लोगों को प्रभावित करती है।
  2. प्रभाव ऐसा है जिसे अनुचित व हानिकारक समझा जाता है।
  3. जिसका निवारण सम्भव माना जाता है अथवा इसमें सुधार सम्भावना का है ।
  4. निवारण सामूहिक क्रिया से ही सम्मय है ।

इन तत्त्वों के आधार पर हार्टन और स्ते का विचार है। सामाजिक समस्याएँ उत्पत्ति में सामाजिक हैं कि वे समाज के बहुत सदस्यों को प्रभावित करती है), परिभाषा में सामाणिक है (योकि समाज उन्हें अनुचित मानता है)।

तथा सुधार में सामाजिक हैं (मनोकि सामूहिक प्रयास पर बल दिया जाता है) । सामाजिक समस्याओं को सामूहिक प्रयत्नों के बाचार पर व्यक्ति तनी कर पाते हैं जब उनके सोचने में ये भारत होते हैं|

एक विश्वास कि जीवन की परिस्थिति को सुधारा जा सकता है,इन परिस्थितियों को सुधारने का निश्चय, सुधार लाने व संप्रति के लिए वैज्ञानिक ज्ञान तथा तकनीकी निपुणतां (technological skill) का प्रयोग तथा

व्यक्तियों में एक गहन विश्वास कि उनकी बुद्धि और प्रभात के कारण उनको समुप्रति की कोई सीमा नहीं है।

वस्तुतः हम कहते है कि मनुष्य अयमा समूहों के व्यवहार से उत् दशाएँ जो आधारभूत सामाजिक मूल्यों को चुनौती है तथा जिस चुनौती सचेत होकर समाज के बहुसंख्य लोग अपेक्षित कार्य करने की आवश्यकता अनुभव करते हैं, सामाजिक समस्याएँ कही जी।

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