रोगी परीक्षा विधि | Rogi Pariksha Vidhi PDF In Hindi

रोगी परीक्षा विधि – Rogi Pariksha Vidhi Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

पवित्र, सिद्धहस्त तथा उपकरणों से युक्त हो । उसकी सभी इन्दिरियां ठीक होनी चाहिये, जिसमे रोग का ज्ञान ठीक ठीक हो सके और बैय के व्यक्तित्व का प्रभाव भी रोगी के मानसपटल पर पूर्ण रूप से पगे इममे मेग्र के प्रति रोगी की श्रद्धा बढती है, जिससे थादेशानुकूल कार्य करने में चिकित्सा में सफलता मिलती है।

पैद्य में रोगी की प्रकृति का ज्ञान प्राप्त करने की क्षमता हो तथा थीयों की प्रकृति का भी पूर्ण ज्ञान हो ।

इनके साथ साथ विकार की शान्ति करने के लिए क्या करना चाहिये, इसका भी पूरा ज्ञान होना चाहिये । प्रत्युत्पन्न मतित्व वैद्य का अत्याचबरु गुण ।

किसी इंशकाल में तथा आत्ययिक अवस्थी विकार का सयुक्तिक विनिश्चय कर शीघ्र उसका उपचार करना ही बेंच का कर्तव्य है। अवसर पर नूक जाना सबसे बड़ी अयोग्यता है ।

भैया कितनी भी शास्त्रीय योग्यता रखता रो, किन्तु यदि अवसर पर रत्य एवं किकतव्यविमूट हो जाय तो उसकी विद्सा किसी काम की नहीं। शालों में बैद् की उपमा धानुक से दी गई है ।

जिस प्रकार कुशल भजुर्थर अपने निकटवर्ती लक्ष्य में नहीं चूकता उसी प्रकार बंदा अपने गुणों एवं उपकरणों से युक्त होने पर साच रोगों की चिकित्सा में अचस्य सफल होता है। यदि यह इस पार्य में असफल हो जाता है तो यस्तु कर्मसु निष्णातो घाप्ट्याच्द्राख्यहिष्कृतः ।

स सासु पूां नामोति धध पाति राजतः उमावेशावनिपुणायसनों स्वकर्मणि ।उससे उसकी योग्यता सिद्ध होती है और सारा सैद्धान्तिक शन निरर्षक हो जाता है।

भानुष्क जब अपने लक्ष्य में चूक जाता है, तो उसका सारा वाग्जाल व्यवं हो जाता है।

उसी प्रकार चिकित्सक की सफलता भी उसकी योग्यता की सची कसौटी है । प्रायसर पर सव्य हो जाना बहुत बड़ी अयोग्यता है ।

निकृष्टचेप, कठोर-रक्ष, स्तब्ध, निन्दित रयान में रहने वाले तथा बिना चुलाये स्वयं रोगी के पर उपस्थित हो जाने वाले चंद्य धन्वन्तरि के समान योग्य होगे पर भी जनता द्वारा सम्मानित नहीं होते।

लेखक प्रियव्रत शर्मा-Priyavrat Sharma
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 450
Pdf साइज़16.4 MB
Categoryस्वास्थ्य(Health)

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