मीरा की प्रेम साधना | Meera Ki Prem Sadhana

मीरा की प्रेम साधना | Meera Ki Prem Sadhana Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

अरे । एक क्षण मी तो नही होगा और ओ छलिया । बो कपट । फिर वही लुका-छिपी । वही धूप छाँह । अभी भर आँख देख ही कहां पायी थी, हरे । पूरा एक क्षण भी नही बीतने पाया और तुम्हारी छवि झिलमिल झिलमिल-सी होकर पता नही कहाँ किस अदृश्य में छिप गयी ।

प्रभो । इतनी दया कर जब आये ही तो एक क्षण और ठहर जाने में क्या लगता मै तो तुम्हारी ही बन्दिनी हूँ, अपनी इस चरणो की चेरी को इतना क्यो भरमा रहे हो ?

अधिक नही, बस एक बार भर आँख देख लेती, एक क्षण तुम्हारे रूप को निरख पाती, एक बार तुम्हारे परम पावन चरणो को अपने भूखे प्यासे प्राणो से सस्पर्श कर पाती इन कमल कोमल,

परम शीतल, त्रिविष ज्वाला-हरण चरणो को अपने बक्षस्थल से लगा कर जी की ज्वाला शान्त कर पाती अपने हृक्य की इस अल्हड़ लालसा को पूरी कर पाती । यह तुम्हारी कैसी निठुर लीला है, ओ मेरे जन्म जन्म के ग्यारे साथी ।

और, तुम तो मेरे जन्म-मरण के साथी हो देव ! ससार मे जब कोई भी ‘अपना’ नही होता तब भी तुन मेरा अपना, एकमात्र ‘अपना’ बनकर सदा सदैव साथ बने रहते हो ।

सब कोई मुझे छोड दे पर तुम मुझे कैसे छोडोगे ? कितने इस हृदय के आँगन आये और चले गये ; आज उनकी धूमिल छाया भी नही है । भूल से, मोह और आसक्ति से उन्हे ही अपने ‘प्राणो का देवता’ मानकर उनके चरणो मे आत्मार्पण करना चाहा

परन्तु हरि ! हरि ! तुम कितने उदार, कितने दयालु हो ! उसी समय, ठीक उस पागल बेला मे मेरे प्राणो में अपना प्रकाश फेककर, मेरे हृदय में अपनी ज्योति डालकर, मेरे अन्तस्थल में अपनी प्रीति बरसाकर और मेरी आँखो में अपनी छवि की माधुरी बिखेर कर मुझे जगा लिया-‘ओ भोले प्राणी |

संसार मे किस किस के चरणो में अपने को निछावर करोगी ? किस-किस रूप पर अपने को लुटाओगी ? रूप की धूप में यो न जलो । लावण्य की धार मे यो न बहो । अपने को सम्हालो और मेरी ओर देखो |

लेखक भुवनेश्वरनाथ मिश्र (माधव) – Bhuvaneshvarnath Mishra
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 315
Pdf साइज़16.3 MB
Categoryसाहित्य(Literature)

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