मन्वन्तर महाकाव्य | Manvantara Mahakavya

मन्वन्तर महाकाव्य | Manvantara Mahakavya Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

शरीर तथा स्वास्थ्य की सर्वथा विवकञ रिमति में ।े पकतिय लिखनी पड़ रही है किक स महाकाव्य को पुद्रणार्थ दने हेतु ऐसा करना अनिवार्य था। अतएस एक व्यापक विषय को उपयुक्त कलेवर न देकर

अत्यन्त सूक्ष्म कलेवर में सीमित करने की विवाता है। पर विषय संकोच हेतु निवेदक समाप्रार्थी है। यहाँ मन्वनाराब का प्रयोग पारम्थरिक अर्थ में नहीं किया गया है।

वस्तुतः यह शब्द प्रयोग भी प्रयोगात्मक ही है या इस महाकाव्य को ‘प्रयोगात्मक विशेषण नहीं दिया गया है। प्राय: ‘लोकायन’ ( महाकाव्य) के गियान, समीक्षकों का यह मत था

महाकाव्य की यह अभिनव विधा मेरे द्वारा संस्थापित हो गई है। यों भी विचार- महाकाव्य अथवा चिन्तन-महाकाव्य को समीक्षा-जगत में अतीत में मान्यता दे दी थी।

अतएव ‘मन्वन्तर के लिए निःसंकोच भाव से महाकाव्य का अभिधान दिया जा रहा है। आशा है, प्रयोगात्मक तथा प्रयोगात्मक के विभेद में न पाकर समीक्षक हिन्दी- संसार इसका अवलोकन करेगा

विषय वस्तु एवं प्रस्तुति पर, पूर्वाग्रहमुक्त होकर, विचार व्यक्त करें । यह निवेदन करते हुए मैं ‘मन्वन्तर’ के प्रथम सर्ग की प्रारम्भिक पंक्तियों उद्मृत करना आवश्यक मानता हूँ।

दर्शन एवं संस्कृति के कालप्रवाह में परिवर्तन का आना और परिवर्तन के कारण सामाजिक समतल का विषम हो जाना स्वाभाविक है। जलप्रवाह एवं झंझावात के कारण सम भूमि स्वभावतः कुछ-न-कुछ विषम हो जाती है।

अतएव युग-चिन्तकों को सामाजिक समतलता के पुनस्संस्थापन हेतु चिन्तन करना ही पड़ता है और अभियंताओं को भूमि की समतलता हेतु पुनः प्रयास करना पड़ता है।

यदा-कदा तो इस प्रयास को अभियान का भी रूप देना पड़ता है। हम देख ही रहे हैं कि वर्तमान काल में क्षेत्र-भेद के कारण समाज तथा राष्ट्र में विषम स्थिति उत्पन्न होती रहती है। इसी भाँति विश्व में भी क्षेत्र-भेदभाव

लेखक रामदयाल पांडे-Ramdayal Pandey
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 91
Pdf साइज़5.8 MB
Categoryकाव्य(Poetry)

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