लोकायन महाकाव्य | Lokayan Mahakavya

लोकायन महाकाव्य | Lokayan Mahakavya Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

भूमिका का यह पक्षी रचयिता की आर्थिक अक्षमता का सूचक है । समस्त कृपालुओं को नमन समर्पित करना] [ही चाहिए यों आगामी प्रकाशन की भी कुछ सम्भावना हुई है ।

इस काव्यकृति के प्रकाशन में भी भारी अर्थाभाव बना रहा और सम्बनित सीमाओं में ही यह प्रकाशन हो रहा है । तदनुसार इस निवेदन को भी सीमित रखना पड़ रहा है ।

कहीं जाने आने में अक्षमता एवं विहित वाहन-व्यवस्था प्रायः असम्भव रहने के कारण विक्रय-व्यवस्था भी तो असम्भव ही है । फिर मी लेखन-कार्य तो प्राय: चलता ही रहता और मेरी अन्तिम साँस तक चलेगा ही। अस्तु ।

इस प्रयोगात्मक महाकाव्य का प्रकाशन सर्वथा आवश्यक था क्योंकि इसके पूर्व प्रकाशित ‘युगान्तर’ ( प्रयोगात्मक महाकाथ्य ) फा पूरक है लौकायन और दोनों को कमश लमातार) पढ़ना ही मम्यक् होगा।।

क्रमशः दोनों के पारायण से यह सत्यबोध होगा ही। दोनों के सग-शीपकों की सूची से भी यह प्रत्यक्ष होता है । ‘गणदेवता । काव्यसंग्रह ), २ ‘अक्क’ । प्रबन्ध काव्य ). पक्तिमयो (नारीयाक्ति-काय्यचयनिका ) ४.

राष्ट्रव्यंजना (राष्ट्र के विविध आयामों की काध्यचय निका), ५ यूगान्तर और ‘६० लोकायन ‘ तक की प्रकाशम यात्रा के कृपाल सह्योपियों के प्रति में चिर कृतज्ञ रमा ।

इस प्रसंग में विशेष सेवन आवश्यक नहीं है । अपनी का ययावा के प्रारम्भिक काल में हो, गणदेवता’ के पुरोत्राक (कुछ दर्शन, कुछ चिन्तन। में ही यह संकेत दे चुका था कि साहित्यकारों का दार्शनिक पक्ष होना ही चाहिए

और उन्हें कुछ स्वतंत्र चिन्तन भी करना ही चाहिए । हमारा तथा सभी मानवों का कुछ राष्ट्रीय दर्शन तो होता ही है परन्तु उनका कुछ स्वतंत्र एवं स्वकीय चिन्तन भो अवश्य होना चाहिए, जो सुधारोन्मुख एवं क्रान्तिमूलक हो । तद अन्तिम साँस तक चलेगा ही। अस्तु ।

लेखक रामदयाल पांडे-Ramdayal Pandey
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 90
Pdf साइज़5.3 MB
Categoryकाव्य(Poetry)

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