क्या गुरु बीना मुक्ति नहीं? | Kya Guru Bina Mukti Nahi

क्या गुरु बीना मुक्ति नहीं? | Kya Guru Bina Mukti Nahi Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

संकीर्तनके समय मुक्तकण्ठसे भगवान्के नामोंका घोष करना चाहिये। ज्ञान, विद्वत्ता, पद, धन आदिके अभिमानमें चुप नहीं बैठ रहना चाहिये। खड़ा कीर्तन होता हो तो संकोच छोड़कर खड़े हो जाना चाहिये।

कहीं हमारे किसी आचरणसे भगवत्रामसंकीर्तनका अपमान न हो जाय। परंतु नाचना चाहिये प्रेमावेश होनेपर ही, लोग-दिखाऊ नहीं। कलाका नृत्य दूसरी चीज है एवं प्रेममय भगवन्नामकीर्तनका दूसरी।

याद रखना चाहिये, भगवन्नामकीर्तन बहुत ही आदरणीय और ऊँचा साधन है। इसका ऊँची-से-ऊँची भावनासे साधन करना चाहिये; ऊँचे-से-ऊँचे आचरणोंसे युक्त होकर कीर्तन करना चाहिये।

पवित्र पुरुषोंद्वारा किये हुए भगवत्नामकीर्तनकी ध्वनि जहाँतक पहुँचेगी वहाँतकके समस्त जीवोंका अनायास ही कल्याण हो सकता है। ऐसे ही जिसके मनमें चेलेकी इच्छा होती है, वह चेलादास होता है।

जिसके मनमें गुरु बनने की इच्छा है, वह दूसरे का कल्याण नहीं कर सकता। जो चेलेसे रुपये चाहता है, वह गुरु नहीं होता, प्रत्युत पोता-चेला होता है। कारण कि चेलेके पास रुपये हैं

तो उसका चेला हुआ रुपया और रुपयेका चेला हुआ गुरु तो वह गुरु वास्तवमें पोता-चेला ही हुआ! विचार करें, जो आपसे कुछ भी चाहता है, वह क्या आपका गुरु सकता है? नहीं हो सकता।

जो आपसे कुछ भी धन चाहता है, मान-बड़ाई चाहता है, आदर चाहता है, वह आपका चेला होता है, गुरु नहीं होता। सच्चे महात्माको दुनियाकी गरज नहीं होती, प्रत्युत दुनियाको ही उसकी गरज होती है।

जिसको किसीकी भी गरज नहीं होती, वही वास्तविक गुरु होता है। कबीर जोगी जगत गुरु, तजै जगत की आस। जो जग की आसा करै तो जगत गुरु वह दास॥

जो सच्चे सन्त-महात्मा होते हैं, उनको गुरु बननेका शौक नहीं होता, प्रत्युत दुनियाके उद्धारका शौक होता है। उनमें दुनियाके उद्धारकी स्वाभाविक सच्ची लगन होती है।

लेखक रामसुख दास-Ramsukha Das
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 59
Pdf साइज़1.6 MB
Categoryधार्मिक(Religious)

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