क्रिया योग रहस्य | Kriya Yoga PDF In Hindi

क्रिया योग – Kriya Yog Rahsya Book/Pustak PDF Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

यह संसार है। इसमें सृष्टि के प्रारंभ से अनन्त जीव अपने कर्मों का भोग कर रहे हैं। कृमि से लेकर देवताओं तक अपने-अपने ढंग के भोग भोगने में संलग्न हैं।

सभी ईश्वर की माया के वशीभूत हैं। हमारे शास्त्रों के अनुसार सृष्टि के आरंभ होने के पूर्व केवल अविनाशी ब्रह्म ही सर्वत्र था। उपरांत उसकी त्रिगुणात्मक प्रकृति के द्वारा सृष्टि का विस्तार हुआ।

सांख्य के अनुसार “सत्य रजस्तमस्य साम्यावस्था प्रकृति” तीनों गुणों की साम्यावस्था को प्रकृति कहते हैं। इन्हीं गुणों में से सर्व प्रथम सतोगुण का विकास हुआ और देवताओं आदि की प्रथम सृष्टि हुई।

ब्रह्मा जी का प्रथम प्रादुर्भाव हुआ। उन्होंने अपने संकल्प द्वारा ऋषियों और देवताओं को उत्पन्न किया। फिर उन्होंने इस सृष्टि को और व्यापक बनाने के लिए संकल्लात् सृष्टि को मैगुनि सृष्टि का रूप दिया।

इस कार्य को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने अपने संकल्प से पुरुष एवं स्त्री का जोड़ा ( मनु-शतरूपा ) उत्पन्न किया और उन्हें प्रजा की सृष्टि करने का आदेश दिया। सृष्टि बढ़ने लगी।

इसमें अनगिनत जीवात्माएँ आकर अपने कर्मों के अनुसार नाना प्रकार की योनियों में प्रवेश कर सृष्टि की आवश्यकताओं को पूर्ण करने लगे। हमारे शास्त्रों के अनुसार स्थूल सृष्टि में प्रथम मानव की उत्पत्ति हुई।

परन्तु आज का विज्ञान, इसके विपरीत एक कोशीय जीव की रचना की सृष्टि का प्रथम जीव मानता है। जो भी हो हमारा शास्त्र ही हमें विश्वसनीय मालूम पड़ता है।

एक बात तो अब सभी स्वीकार करते हैं कि कीट, पतंग एवं वनस्पतियों तक में प्राण का अवस्थान है। अर्थात् यहाँ सब कुछ प्राणमय है। शास्त्रों में तो पहले से ही “सर्व प्राणमयम् जगत” का वाक्य गूंजता रहा।

अतएव संसार में जितने रूप दिखाई पड़ते हैं, उन सबमें आत्मा है। यह आत्मा क्या है, इसे जानना आवश्यक है।

हम देखते हैं कि जब कोई जीव मरता है, तो उसका स्थूल शरीर विनाश को प्राप्त हो जाता है, परन्तु जिसके रहने से उसमें गतिशीलता थी, वह प्राण उस शरीर को छोड़कर कहीं चला जाता है एवं उसका स्वरूप क्या है, इसे जानने का कोई प्रयत्न नहीं करता। यह प्राण ही सब कुछ है।

हम भोजन करते हैं परन्तु हेमारी जानकारी के बिना ही वह अपने आप पेट में पचता है तथा उस पचे हुए भोजन के रस से शरीर के लिए आवश्यक तत्व ( रक्त, मांस,मज्जा, हड्डी, वीर्य आदि ) स्वतः बन जाते हैं।

ये सब प्रक्रियाएँ कौन करता है ? हमारे शरीर में कौन है, जो भोजन का स्वाद ग्रहण करता है वह कौन है ? जो हृदय और श्वांस को चलाता है ? जिसके न रहने पर शरीर मृत हो जाता है, वह शक्ति क्या है ?

इन सब प्रश्नों का एक उत्तर है प्राण ! यह प्राण (आत्मा) ही हमारे समस्त कार्यों का सम्पादन करता है। यह प्राण हमारी इतनी सेवा करता है, फिर भी हम इसे जानते नहीं हैं।

इस प्राण को यदि जानने की कोशिश करें तो हमें, जो इसको जानता हो, उसकी शरण में जाना पड़ेगा। यहीं से गुरु परम्परा का प्रारम्भ है तथा उसे जानने के लिए जो कुछ किया जाता है, उसी को धर्म कहते हैं।

जब हम प्राण को जान जायेंगे, तभी हम यह भी समझ सकते है कि यह प्राण जो हमारी इतनी सेवा करता है, उसकी सेवा कैसे की जाय तथा वह कैसे तृप्त हो सकता है ?

लेखक माहेश्वरी प्रसाद दुबे-Maheswari Prasad Dubey
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 22
Pdf साइज़4.7 MB
Categoryज्योतिष(Astrology)

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