गुप्त भारत की खोज | Gupt Bharat Ki Khoj PDF

गुप्त भारत की खोज – Gupt Bharat Ki Khoj Book/Pustak PDF Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

इस पुस्तक का नाम यदि ‘पवित्र भारत’ होता ता बहुत ही उचित होता, कारण कि यह वर्णन उस भारत को खोज का है जो पवित्र होने के कारण ही गुप्त है।

जीवन को अति पवित्र बातें कभी साधारण जनता के सामने प्रदर्शित नहीं की जातीं। मनुष्य का सहज स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि वह ऐसी बातों को अपने ही अंतरतम तल के निगूढ़ कोषागार में ऐसी सावधानी के साथ छिपाये रखता है कि शायद ही किसी को उनका पता लग पाता हो ।

उनका पता लगा लेने वाले वे ही थोड़े से व्यक्ति होते हैं जिनको आध्यात्मिक विषयों की सच्ची लगन होती है।

व्यक्ति के समान ही किसी देश के विषय में भी यह कथन घूर्ण रूप से लागू होता है। कोई भी देश अपने पवित्रतम विषयों को गोपनीय रक्खेगा।

किसी भी अजनवी के लिए यह पता लगा लेना सरल नहीं है कि इंगलैन्ड अपनी किन बातों को सब से अधिक पवित्र समझता है। यही बात भारत के सम्बन्ध में भी ‘ठीक है। भारत का अत्यन्त पवित्र अंग वही है जो अत्यन्त गुप्त है।

ब्रह्मा ने दावे के साथ कहा कि आर्यों ने द्रविड़ों से ही और कई चीजो की भाँति योग-विज्ञान भी सीखा था। लेकिन जब मैंने कुछ विद्वानों से इस बात का उल्लेख किया तो उन्होंने इस राय को एकदम आंत कहा ।

अतः योग-विज्ञान की उत्पत्ति के बारे में मैं और अधिक न लिख कर इसे यहीं छोड़ देना उचित समझता हूँ। मैं योग और शारीरिक व्यायाम के विषय पर कोई ग्रंथ लिखने नहीं बैठा हूँ।

अतः मै कुछ अभ्यासों का ही जिक्र करूँगा जो हठयोग में बहुत मुख्य हैं। ब्रह्म ने जो बीसों आसन मुझे दिखाये थे वे बहुत ही विचित्र और यूरोपियनों की दृष्टि में या तो परिहासपूर्ण या एकदम असम्भव या दोनों प्रकार के जचेंगे।

इनमें शरीर के अवयवों को बहुत ही टेढ़ा-मेढ़ा करना पड़ता है। ब्रह्म को इन अभ्यासों का प्रदर्शन करते हुए जब मैंने देखा तो मुझे साफ साफ प्रकट हुआ कि हठयोग बड़ा ही कठिन है ।

मैंने ब्रह्म से प्रश्न किया : “आपके हठयोग में ऐसे कितने अभ्यास हैं ?” “हठयोग मे ८४ आसन है। लेकिन मुझे तो अभी ६४ हो आसन मालूम है ।

बोलते बोलते उन्होने एक नवीन आसन, जो उन ६४ मे से एक था, धारण किया और उसमे उन्हे उतना ही यारा था जितना कि मु्के अपनी आराम-कुर्सी में उन्होने मुभसे कहा कि यह सप्त उनको सबसे अधिक प्रिय है।

यह उतना कठिन न था और कष्टप्रद तो नहीं मालूम होता था । उनका धायों पॉव जंघा से लगा था और दाहिना पॉव मुड़कर नीचे रक्खा था जिसपर उनके शरीर का समस्त भार सधा था।

मैंने पूछा- “इस आसन का क्या प्रयोजन है ?” इस आसन में बना रह कर यदि योगी एक विशेष प्रकार का प्राणायाम करे तो उसको चिर-यौवन प्राप्त होगा।” “वह प्राणायाम किस प्रकार का है ?” मुझे यह बतलाने की अनुमति नहीं है। “इन समस्त आसन के कौन से प्रयोजन है ?”

लेखक डॉ पाल ब्रंटन – Paul Brunton
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 586
Pdf साइज़22.7 MB
Categoryइतिहास(History)

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