गीतावली | Gitawali

गीतावली | Gitawali Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

लिये बुद्धिरूप मृगनयनी बुला ॥२॥ तुलसीदासजी कहते है . उस मनोहर मालाको कवितारूप कमनीय कामिनीके कण्टमें पहना- कर मैं प्रफुल्लित हो और हे खुश्रेष्ठ !

में उस (कविता-कामिनी) के साथ मिलकर तुम्हारे ही पवित्र चरित्र गाकर तुम्हारे हो चरणोंमें चित्त लगाऊँ॥३॥सोइये लाल लाडिले रघुवाई। मगन मोद लिये गोद सुमित्रा यार वार यलि जाई ॥ १ ॥

हँसे हँसत, अनरसे अनरसत प्रति वियनि यो झाँई । तुम सबके जीवनके जीवन, सकल सुमंगलदाई ॥ २ ॥ मूल मूल सुरवीथि-वेलि, तभ-तोम सुदल अधिकाई । नखत सुमन,नभ-विटप बाडी मानो छपा छिटकि छाई छाई ॥ ३ ॥

हो जैभात, अलसात, तात ! तेरी चानि जानि मैं पाई। गाइ गाइ इलराइ बोलिही सुख नींदरी सुहाई ॥४ ॥ बछरु, छबीलो छगनमगन मेरे, कहति मल्दाइ मल्हाई। सानुज हिय हुलसति तुलसीके प्रभुकी ललित लरिकाई ॥ ५ ॥

सुमित्रा आनन्दमग्न होकर रामको गोदमें ले बार-बार बलिहारी जाती हैं और कहती हैं-हे लाल ! हे लाडिले रघुवीर ! सो जाओ॥१॥ जैसे विम्बके ही अनुरूप उसकी शाई पड़ती है

उसी प्रकार हमारे हँसनेसे तुम हंसने लगते हो और उदास होनेसे उदास हो जाते हो । तुम तो सभीके जीवनके जीवन और सब प्रकारके मद्गल देनेवाले हो ॥ २ ॥ [ अहा ! इस समय रात्रिकी कैसी अपूर्व शोभा है ! ]

मूल नक्षत्र जिसका मूल है, आकाशगङ्गा बेल है, अन्धकारराशि पत्र-समूह है तथा नक्षत्रगण पुष्पावली है। है ललन ! हे लोने वत्स ! माता बलि जाती है View Page n423 नींद का समय हो गया है;

अतः मनोहर चरितवाले चारों भाई ! सुखपूर्वक सो जाओ ॥ १ ॥ वालकोंको छातीसे चिपटाकर माता पुचकार-पुचकारकर कहती है, ‘हे मेरे छोटे छबीले छौना, हे मेरे आनन्दकन्द, है।

कुलदीप कुमार बनके लिये चंद्रमा, मेरे रघुकुल- भूषण राम !’ आदि ॥२॥ रघुनाथजीकी बाललीला संतजनों के लिये अति सुन्दर और शुभप्रद कामधेनु ही है ।

लेखक Gita Press
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 449
Pdf साइज़22.2 MB
Categoryधार्मिक(Religious)

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