गीतावली तुलसीदास | Gitavali Tulsidas PDF In Hindi

कृष्ण गीतावली हिंदी अर्थ सहित – Gitawali Pdf Free Download

संस्कृत गीतावली हिंदी अर्थ सहित

कविचक्रचूडामणि गोसाई श्रीतुलसीदासजीके ग्रन्थोंमें कलेवरकी दृष्टिसे रामचरितमानसके पश्चात् दूसरा नंबर गीतावली का ही है। इसमें सम्पूर्ण रामचरित पदोमें वर्णन किया गया है।

परन्तु रामायणकी अपेक्षा इसकी वर्णनशैली कुछ दूसरे ही ढंगकी है। रामायण महाकाव्य है, उसमें सभी रसोका साङ्गोपाङ्ग दिग्दर्शन कराया गया है; वहाँ कविहृदयके सभी भावोंका गम्भीर विश्लेषण देखने में आता है ।

परन्तु गीतावलीमें आरम्भसे लेकर अन्तपर्यन्त कविका एक ही भाव दिखायी देता है; वह कथानकके क्रमकी अपेक्षा न करके अपने इष्टदेवकी मधुर झाँकी करनेमें ही संलग्न है।

गीतावलीमें उसका ललित भाव ही व्यक्त हुआ है। जहाँ-जहाँ भगवान्के रूपमाधुर्य अथवा करुणरसके आस्वादन का अवसर मिला है वहाँ-वहाँ तो वे मध्याह्नकालीन सूर्यकी तरह मन्दगतिसे चलते हैं;

इसके विपरीत जहाँ अन्य विषय है उसकी ओर दृष्टिपाततक नहीं करते यहाँतक कि अन्य युद्धोंकी तो बात ही क्या, रावणवधका भी उन्होंने जिक्र नहीं किया; परशुरामजी के विषय में ‘भंज्यौ भृगुपति-गरम सहित, तिहुँ लोक बिमोह कियो ॥

तुलसीदासजी कहते है . उस मनोहर मालाको कवितारूप कमनीय कामिनीके कण्टमें पहना- कर मैं प्रफुल्लित हो और हे खुश्रेष्ठ !

आज बड़ा मङ्गलमय दिन है, आजकी शुभ घड़ी बड़ी सुहावनी है। आज सौन्दर्य, शील और गुणके आगार भगवान् राम महाराज दशरथ के भवनमें प्रकट हुए हैं ॥ १ ॥

अति पवित्र चैत्र मास है। तथा लान, ग्रह, वार और योग, इन सबका समुदाय भी परम पावन है । चराचर प्राणी बड़े हर्षयुक्त हैं तथा ब्राह्मणोके शरीरोंमे रोमाञ्च हो रहा है ॥ २ ॥

देववृन्द आकाशमें दुन्दुभी बजाते हुए पुष्पोंकी वर्षा कर रहे हैं तथा कौसल्या आदि माताओंका मन बड़ा ही हर्षित हो रहा है । हमसे इस सुखका वर्णन नहीं हो पाता ॥ ३ ॥

दशरथ जीने पुत्रका जन्म होना सुनकर समस्त गुरुजन और विप्रवृन्दको बुला लिया है और बड़ी पवित्रतासे सम्पूर्ण वेदविहित क्रियाएँ की है । इस समय उनके हृदयमें आनन्द ॲटता नहीं है ॥४॥

में उस (कविता-कामिनी) के साथ मिलकर तुम्हारे ही पवित्र चरित्र गाकर तुम्हारे हो चरणोंमें चित्त लगाऊँ॥३॥

सोइये लाल लाडिले रघुवाई। मगन मोद लिये गोद सुमित्रा यार वार यलि जाई ॥ १ ॥

हँसे हँसत, अनरसे अनरसत प्रति वियनि यो झाँई । तुम सबके जीवनके जीवन, सकल सुमंगलदाई ॥ २ ॥

मूल मूल सुरवीथि-वेलि, तभ-तोम सुदल अधिकाई । नखत सुमन,नभ-विटप बाडी मानो छपा छिटकि छाई छाई ॥ ३ ॥

हो जैभात, अलसात, तात ! तेरी चानि जानि मैं पाई। गाइ गाइ इलराइ बोलिही सुख नींदरी सुहाई ॥४ ॥

बछरु, छबीलो छगनमगन मेरे, कहति मल्दाइ मल्हाई। सानुज हिय हुलसति तुलसीके प्रभुकी ललित लरिकाई ॥ ५ ॥

सुमित्रा आनन्दमग्न होकर रामको गोदमें ले बार-बार बलिहारी जाती हैं और कहती हैं-हे लाल ! हे लाडिले रघुवीर ! सो जाओ॥१॥ जैसे विम्बके ही अनुरूप उसकी शाई पड़ती है

उसी प्रकार हमारे हँसनेसे तुम हंसने लगते हो और उदास होनेसे उदास हो जाते हो । तुम तो सभीके जीवनके जीवन और सब प्रकारके मद्गल देनेवाले हो ॥ २ ॥ [ अहा ! इस समय रात्रिकी कैसी अपूर्व शोभा है ! ]

मूल नक्षत्र जिसका मूल है, आकाशगङ्गा बेल है, अन्धकारराशि पत्र-समूह है तथा नक्षत्रगण पुष्पावली है।

है ललन ! हे लोने वत्स ! माता बलि जाती है नींद का समय हो गया है;

अतः मनोहर चरितवाले चारों भाई ! सुखपूर्वक सो जाओ ॥ १ ॥

वालकोंको छातीसे चिपटाकर माता पुचकार-पुचकारकर कहती है, ‘हे मेरे छोटे छबीले छौना, हे मेरे आनन्दकन्द, है।

कुलदीप कुमार बनके लिये चंद्रमा, मेरे रघुकुल- भूषण राम !’ आदि ॥२॥

रघुनाथजीकी बाललीला संतजनों के लिये अति सुन्दर और शुभप्रद कामधेनु ही है ।

लेखक Gita Press
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 449
Pdf साइज़22.2 MB
Categoryधार्मिक(Religious)

गीतावली – Geetavali Book Pdf Free Download

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