ध्वन्यालोक | Dhvanyaloka

ध्वन्यालोक | Dhvanyaloka Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

यो ही अर्थान् स्वयं अधिक से अंधा होने के कारण । “जन’ का अर्थ है लोक में प्रसिद्ध केवल गतानुगतिकता का महारा नेवा । उसका अमाधारण गुण- गणों से महनीय शरीरबाले का । ‘कपोल की उपमा में अति विमा यनायट के लावण्यसर्वस्वभून मुख के मध्यवर्ती प्रधानभूत कपोल की उपमा में प्रत्युत

उससे अधिकवस्तु की जानी चाहिये उससे दृर गिरा दुआ शश्िश्रिम्व कलळक के काज से कुटिल कर दिया गया है। इस प्रकार यदि भेडाचाल के प्रवाह में लोक पड़ा हुआ है तथापि परीक्षक गदि परीक्षा करें तो बेनारा एकमात्र कृपापात्र जी चन्द्र नाम से प्रसिद्ध है बह चन्द्रमा है।

अर्थात यस्त, बिलासशून्यत्व, मलिनत्व इत्यादि दूसरे धी में मकान जी अर्थ (पमा गन्द्र है)। यहाँ पर जिस प्रकार व्यङ्ग्यथमोत्तर की संक्रान्ति होती है वैसा पहले कटे हुये के समान समझ लिया जाना चाहिये । ऐमा ही आगे भी ।

तारावनी दूसरा उदाहरण (उस नायिका) के कपोलों की उपमा में लीग यों ही चन्द्राबिम्ब का उल्लेख कर दिया करते हैं। वास्तविक रूप में विचार करने पर बैग चन्द्रनन्द्र ही है । ‘योही’ से व्यञ्जना निकलती है कि लोग प्रायः अजान से अन्धे वे अधिकतर विना सोचे समझे ही बात किया करते हैं।

लोग’ कहने का आशय यह है कि सर्व साधारण व्यक्तियों का केवल यही सहारा होता है कि वे लोकप्रसिद्ध गतानुगतिकता के आधार पर बात किया करें सामान्यतया जैमा प्रसिद्ध होता है लोग वैसी ही बात किया करते हैं। छानबीन कर बोलनां सर्वसाधारण के वश की बात नहीं।

उसके का आशय यह है कि उस नायिका का शरीर असाधारण गुणों के कारण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है । कपोल की उपमा में कहने का आशय यह है कि नायिका स्वयं ही लावण्यमयी है उसे लावण्य के लिये प्रसाधनों की भी आवश

लेखक राम सागर त्रिपाठी-Ram Sagar Tripathi
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 784
Pdf साइज़73.2 MB
Categoryधार्मिक(Religious)

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