भवरोग की रामबाण दवा | Bhavrog Ki Ramban Dava (Panacea) PDF

भवरोग की रामबाण दवा – Bhavrog Ki Ramban Dava Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

अब यह प्रश्न होता है कि यह द्वन्द्वसहिष्णुता प्राप्त कैसे हो : इसका पहला साधन तो यह विचार है कि सासारिक हानि-अभ) सुख-दुःख जो कुछ होता है, सब हमारे पूर्वकृत कर्म का फल है

कर्मफल भोग करना ही पड़ता है। सश्चित और क्रियमाणका तो नाश हो जाता है; परन्तु प्रारब्ध का नाग रूप से नहीं हो सकता । अवश्य ही ज्ञानी पुरुपमें कर्ता और भोक्तापनका

अहंकार न होनेसे प्रारब्धकर्मके अनुसार फल होनेपर भी उनपर उसका कोई प्रभाव नहीं पडता । तथापि खरूपसे प्रार्धका नाश प्रायः नहीं होता । नियन्ता भगवान्के द्वारा फल देनेके लिये

नियत किये हुए कर्मोका फल, जिनसे जन्म हुआ है, मृत्युकालतक विधियत् भोग करना ही पडेगा । प्रार्भभोगसे हमारे कर्म क्षय होते हैं, और जितना ही कर्मोका जंजाल कटता है,

उतना ही हम परमात्माके समीप पहुँचने हैं । वम-से कम कमोंका एक बड़ा भारी ऋण सिरसे उतर ही जाता है। अतएव इनको आनन्दपूर्वक सहन करना चाहिये।

एक बात यह याद रखनेकी है कि सुखकी प्राप्तिमें हर्ष होना और दुःखमें विवादसे जलना दोनो ही असहिष्णुताके तो प्रकार है । कई लोग इस असहिष्णुतामूलक सुखको ही आनन्द मानते हैं।

परन्तु यह उनकी भूल है । तत्त्ज्ञ पुरुषोंने असहिश्युतामूलक सुख और दुःख दोनोको ही परिणाममे दुःखरूप होनेसे दुःख ही बतलाया है अतएव सुख-दुःख दोनोंमें ही सहिष्णुता होनी चाहिये ।

दोनोंमें ही विकारहीन स्थिति होनी चाहिये । ज्ञान विचार करनेपर पता लगता है-मुख-दु ग्खादि बास्तबमें किसी वस्तुमें नहीं हैं, इनका सोत हमारे मनमें ही है ।

जहाँ प्रतिकूलता या अभावका अनुभव है वहीं दुख है, और जहाँ अनुकूलता या अभावका अनुभव नहीं है वहीं सुख है । अनुकूलता और प्रतिकूलता का आधार है-राग और द्वेष ।

लेखक हनुमान प्रसाद-Hanuman Prasad
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 171
Pdf साइज़8.6 MB
Categoryस्वास्थ्य(Health)

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