भक्त पंचरत्न | Bhakta Pancharatna

भक्त पंचरत्न | Bhakta Pancharatna Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

बचपूर्णा दयपर इस मानन्द-श्यका इतना प्रभाव पड़ा कि यह अपनेको संभाल नहीं सकी। उसके हदयका अगयकसदाके लिये दूर हो गया । यह जानन्दको अत्यन्त प्धिकतासे मूर्छित होकर गिर पड़ी ।

रघुनाथके उठकर बैठते ही प्रकाश अन्तर्धान हो गया । गाड़ी नौंदसे जागनेपर मनुष्य जैसे सोचता है-‘आज खूब सुखसे सोया, कुछ भी पता नहीं रहा’ ऐसी ही दशा रघुनाथकी है। उसने सोचा, बडे सुखसे सो रहा था

मुझे किसने जगा दिया ? चारो ओर देखा तो सिवा धने अन्धकारके और कुछ भी दिखायी नहीं दिया। भगवछेरणासे षूर्व-स्मृति जाग उठी, सारी घटनाएँ औरखोके सामने नाचने

लगीं मैं वही रघुनाथ हूँ मैं तो जहर खाकर मर रहा था, उस समय कैसी भयानक वेदना यी, कैसी प्रचण्ड जलन थी । मैं तो उससे मर्शित हो गया था। मेरी उस ज्वालाको किसने शान्त कर दिया

किसने मेरे प्राणहीन হरारमे पुन प्राणोका सञ्चार किया ‘ समझा, प्राणनाथ ! यह तुम्हारा ही काम है, तुम्हारे सिवा हे करुणामय ! दासपर ऐसी करना कौन करता है’ मेरे प्रभु ।

तुम्हारा खेल तुम्हीं समझते हो, गोदसे नीचे पटक देनेवाले भी तुम्हीं हो, फिर बडे प्यारसे हृदयसे लगाकर मुख चूमनेवाले भी तुम्ही हो ! तुम्हारे इस लीला-रहस्यको मुझ जैसा अज्ञानी

जीव क्या समझेगा प्रभो ‘ समक्षनेकी अरूरत भी क्या है। दो, दो, मेरे नाथ अन्यथा दो, নिपत्तिका पहाड ढहा दो,उसकी अपेक्षा उनको दु ख बहुत अधिक होता है जो दूसरेको

दुख देना चाहते है। रघुनाथ जहरके कारण बेहोश हो गया था, उसे अधिक कालतक जहरकी ज्वालासे नही जलना पडा, परन्तु गगाधर, उसकी स्त्री और सातो लडके रातभर

काल्पनिक चिन्ताको चितामे दग्ध होते रहे। यह पाप प्रकट हो गया यह किसीन जाकर राजदरबारमे खबर दे दी ये सिपाही आये इम लोको पकडने के लिये,

लेखक हनुमान प्रसाद-Hanuman Prasad
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 119
Pdf साइज़2.9 MB
Categoryउपन्यास(Novel)

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