औरंगजेब का इतिहास | Aurangzeb History Book PDF

औरंगजेब का इतिहास – Aurangzeb History Hindi Book PDF Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

समकालीन मौलिक ऐतिहासिक उपादानोंके आधारपर लिखकर मैने पाँच जिल्दों में अपने अंग्रेजी इतिहास-ग्रन्थ “हिस्ट्री आफ औरंगजेब” को सन् १९२५ मे पूरा किया था। उस ग्रन्थकी रचना करते समय मैने उस कालके इतिहास विषयक छपे हुए सारे आधार-ग्रन्थोके सिवाय फ़ारसी, मराठी, अग्रेजी, फ्रेंच और पुर्तगाली भाषाओमे प्राप्य हस्तलिखित इति हास-ग्रन्थों, समकालीन लेख-सग्रहों, शाही दरबारके अखबार, आदि सारे उपादानोका भी पूरे पच्चीस वर्ष तक लगातार अध्ययन किया था । उस कालके इतिहासके लिए मेरा यह अंग्रेजी ग्रन्थ पूरी तरह प्रामाणिक मान लिया गया है । अपनी उच्चतम परीक्षाओ में मुगल-कालीन भारतीय इति हास पढ़ाने के लिए सब ही भारतीय विश्व-विद्यालयोंने इस ग्रन्थको अपनी पाठ्य-पुस्तक बनाया । किन्तु उसको उन पाँचो जिल्दोकी पृष्ठ-संख्या कुल मिलाकर कोई दो हजारसे भी अधिक हो जाती है, एवं विश्व-विद्यालयोंके विद्यार्थियोकी सुविधा तथा उपयोगके लिए उस विस्तृत इतिहासको संक्षिप्त कर कोई पाँच सौ पृष्ठोके एक सुसम्बद्ध ग्रन्थके रूप में “ए शार्ट हिस्ट्री आफ़ औरंगजेब के नामसे प्रकाशित किया था । इस सक्षिप्त इतिहासमें मैने कई एक विवेचनात्मक नए महत्त्वपूर्ण अध्याय जोड़ दिए थे । किन्तु अंग्रेजी भाषा न जाननेवालोके लिए तो औरंगजेब के शासन-काल सम्बन्धी मेरी सारो खोजें एव ये ग्रन्थ अब तक बिलकुल ही अज्ञात रहे है ।

आदि जीवन-काल: १६१८-१६५२ ई०

१. उसके शासन-कालका महत्त्व

औरगजेबका जीवन-चरित्र कोई ६० वर्षका भारतवर्षका इतिहास ही हो जाता है । १७ वी शताब्दीके पिछले पचास वर्षों तक (१६५८-१७०७ ) वह शासन करता रहा ।

उसका शासन-काल अपने इस देश के इतिहासमें बहुत ही महत्त्वपूर्ण है । उसके आधि पत्यमे मुगल साम्राज्यकी सीमाएँ अपनी अतिम हद तक पहुँच गई थी ।

प्रारम्भिक कालसे लेकर अंग्रेजी राज्य की स्थापना होने तक भारतमें ऐसे विशाल साम्राज्यकी स्थापना कभी नही हुई थी ।

गजनी से लेकर चटगाँव तक और काश्मीरसे लेकर कर्नाटक तक भारतीय महादेश एक ही शासकके आधीन था । इस्लामने भारतमें अपना आखिरी कदम इसी शासन-कालमे बढ़ाया विस्तार से अभूतपूर्व होते हुए भी इस विशाल- सामाज्यकी राजनैतिक एकता अक्षुण्ण थी ।

इस साम्राज्यके विभिन्न प्रातोका प्रबंध छोटे राजाओके हाथमे न रह कर सीधे बादशाह द्वारा नियुक्त कर्मचारियो द्वारा ही होता था ।

द्वारा नियुक्त कर्मचारियो द्वारा ही होता था । इसी विशेषतांके कारण औरंगजेबका भारतीय साम्राज्य अशोक, समुद्रगुप्त या हर्षके साम्राज्यसे कही अधिक विशाल तथा परिपूर्ण था ।

कितु जिस शासन-कालमे इतना विशाल भारतीय साम्राज्य स्थापित हुआ जितना अंग्रेजोके आधिपत्यसे पहले कभी नही हुआ था, उसी समयमे इस साम्राज्यके पतन व छिन्न- भिन्न होनेके लक्षरण

भी स्पष्ट दिखाई देने लगे । फारसके नादिरशाह व अफगानिस्तानके अहमदशाह ने मुगल बादशाहतका खोखलापन व उसकी राजधानी दिल्लीकी महत्त्वहीनता सिद्ध कर दी थी ।

मराठोने दिल्लीके साम्राज्यमे अपना एकाधिपत्य स्थापित कर मुगल सम्राटोको तिरस्कृत किया था ।

कितु इन सबसे बहुत पहले, औरगजेवकी आँखे वद होनेसे भी पूर्व, मुगल साम्राज्यके खजाने और गौरवका दिवाला निकल चुका था, उसकी शासन-व्यवस्था नष्ट-भ्रष्ट हो चुकी थी, और मुगल-राजसत्ताने देश मे गाति व राज्यकी एकता बनाये रखनेमे अपनी असमर्थता स्वीकार कर ली थी ।

औरगजेवका शासनकाल दो और वातोके लिए भी उल्लेखनीय है ।

इन्ही दिनो अल्पकालीन मराठा-राजवशके भग्नावशेषोमे से मराठा जातीयताका (Nationality) उद्भव हुआ, और सिख सम्प्र दायने भी इसी शासन-कालमे सैनिकरूप धारण करके मुगल साम्राज्य के विरुद्ध तलवार उठाई।

अतएव ईसाकी १८ वी तथा प्रारम्भिक १९ वी शताब्दियोकी प्रमुख ऐतिहासिक धाराओका प्रारभ श्रीरंग जेबके शासन-कालमे उसकी नीतिके कारण ही हुआ ।

मुगल-साम्राज्य दूजके चाँदके समान बढता हुआ अपने पूर्णत्वको पहुॅचा और उसके बाद ही पुन स्पष्ट रूपसे घटने लगा, तब तो उसी शासन-कालमे एक नये युगके प्रभातकी झलक राजनैतिक आकाशमे दिखाई दी ।

भारतके भावी शासकोने अपने पैर अच्छी तरह जमा लिये थे । ईस्ट इंडिया कम्पनीने १६५३ ई० मे मद्रास प्रात व १६ ८७ई० मे बवई प्रातकी स्थापना की थी ।

१६९० ई० मे कलकत्ताकी नीव पडी । इस प्रकार युरोपवासियोके हाथमे आये हुए इन आश्रय स्थानोने एक साम्राज्यके भीतर दूसरे ही स्वाधीन राज्यका रूप धारण कर लिया ।

१७वी शताब्दीके आखिर तक मुगल साम्राज्यकी जड़ भीतर ही भीतर खोखली हो गई थी । खजाना खाली पड़ा था । मुगल सेना दुश्मनो के हाथों पराजित व अपमानित हो चुकी थी, देशमे अलग |

लेखक यदुनाथ सरकार-Yadunath Sarkar
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 470
Pdf साइज़23.4 MB
Categoryआत्मकथा(Biography)

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