अमृत कण | Amrit Kan

अमृत कण | Amrit Kan Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

एक सट्टा खेलते हैं बहुत अधिक प्राप्त करनेके लिये। इतनी रिश्क तो वे उठाते ही हैं कि कलको ये मिनिस्टर न बने तो शायद हमारे इस इन्वेस्टमेटका फल तुरंत नहीं मिलेगा।

कहीं-कहीं पूरी रकम डूबनेका भय भी रहता ही है। कुछ प्रत्याशी जिनको धनियोंसे रुपये नहीं मिलते, अतः वे ऋण लेकर चुनाव लड़ते हैं। वे भी इसी आशापर कि यदि जीत गये तो बहुत कमा लेंगे।

उनके सामने अमुक-अमुकके उदाहरण हैं कि जो पहले अत्यन्त अभावग्रस्त थे, पर विधानसभा या संसदके सदस्य चुने जानेके बाद पैसेवाले हो गये कइयोंके मकान बन गये।

जिस सूत्रसे उनके पास पैसे आये, उन्हीं सूत्रोंसे ये भी अर्थप्राप्तिकी आशा रखते हैं। यह सब क्या है ? असत्य, चोरी और बेईमानीका सीधा प्रोत्साहन ? या नहीं है ?

इस बार जगह-जगह हिंसापूर्ण उपद्रव हाए है। शायद कोई पार्टी बची हो जिसके सदस्यों या समर्थकोंने चोट न की हो या चोट न खायी हो। पत्थर, ईंट बरसाना साधारण-सी बात हो गयी।

प्रधानमन्त्री श्रीइन्दिराजीपर पल्थरोंकी वर्षा हुई, श्रीमधुलिमयेपर घातक प्रहार हुआ और बहुत जगह पत्थर ईंट फेंके गये, छुरे भाकर गये लाठियाँ चलीं, गोलियोंकी बौछार हुई, कई जगह घर फूंके गये,

पोलिंगके खीमेमें आग लगा दी गयी। गन्दे नारे लगाना, गालियाँ बकना तो आम बात थी। तामसिकताका यह ताण्डव नृत्य जनतन्त्र या लोकतन्त्रके नामपर हुआ। बड़ी ही लज्जा की यूब मरने की बात है,।

भारतका पुराना अहिंसावाद तो कभीका भुला दिया गया था गांधीजीका ताजा अहिमावाद भी दफनाया गया- इतनी जल्दी। अब ‘सत्य’ पर आइये। भारतीय संस्कृतिके

अनुसार तो अपने मुँहसे अपनी सच्ची प्रशंसा करना आत्महत्याके सदृश है तथा दूसरोकी सच्ची निन्दा करना भी उनकी हत्या करना है। फिर अपने मुहसे अपनी मिथ्या प्रशंसा और प्रतिपक्षी व्यक्ति अथवा दलके सारे गणोंमें

लेखक हनुमान प्रसाद-Hanuman Prasad
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 352
Pdf साइज़65.6 MB
Categoryसाहित्य(Literature)

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