आक्रांत हिमालय | Akrant Himalaya

आक्रांत हिमालय | Akrant Himalaya Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

हिमालय की धुरी पर इतिहास में प्रथम बार १६४० से १६४० त का काम संप्रभु एवं शक्तिशाली राष्ट्रों के मिलन का क्रांतिकारी एवं पशिया के भाग्य का नियामक काल रहा है। इन दिनों उन घटनायों का सृजन हुआ जिससे आगामी इतिहास प्रतिध्वनित होगा।

प्रिटिश ताज से उन्मुक्त होकर स्वतंत्रता की देवी भारत में आकर स्वतंत्र रहकर भी विभाजित हो गयो । भारत व पाकिस्तान का अस्तित्व १५ अगस्त १९१४ से प्रारम्भ हो गया। सितम्बर १६ ६ को अनत्रादी चीन ने अपने संप्रभुता के अलावा कांति द्वारा शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में क्रमबद्ध हुआ।

इसकी पथक हिमालय को चोटियों तक पहुँची। जनवरी १६३ को बर्मा भी अपनी दासत्ता लोद चुका था। एक स्वतन्त्र राष्ट्र के रूप में एशिया कुल में अपने विकास को प्राप्त करने की सहज चेष्टावश हिमालय को इसने अपनी सीमा के रूप में पाया ।

उस सीमा को ही इसने सत्य माना जिसे इतिहास परम्परा, व प्रकृति ने तय किया था। अफगानिस्तान अपने अतीत से स्वतन्त्रताको कमोवेशरूप में अपने वर्तमान तकु रसा है। दो लाग्य सत्तर हजार वर्गमीसा का यह पहाड़ी मुसलिम राज्य हिमालय का सर्वदा से अनुराध संपर्की रहा है।

इस क्षेत्र की दो महत्वपूर्ण परिस्थितियों एवं घटनायें हैं। पहली परिस्थिति इस के भोगोलिक शक्स से सम्बन्धित है। ब्रिटिश भारत पस के बीच में इस राज्य के पड़ने से इसका इतिहास ब्रिटिश भारत की भौतिक एवं रूस की नीतियों से प्रभावित होता रहा है।

इमोकार रूस के के संभावित पाकमणों से बचने के लिये ब्रिटिश भारत सरकार ने कई सैनिक अभियानों का सफल व असफल आयोजन अफगानिस्तान तक किया। दर्रा खैबर की घटना पर्व सीमा पर सैनिक आयोजन ब्रिटिश नीति के संकेत रहे हैं ।

१५४७ से पूर्व ही राष्ट्रपति ट.न ने द्वितीय पहस्युद्ध के दौरान तथा उसके अंतके समय अफगानिस्तान को सैनिक सथि के अन्तर्गत रखना चाहा। अमेरिकी व रूसी प्रस्तावों तथा अपनो ऐतिहासिक अदम्य स्वतन्त्रता के कारण अमीर ने तटस्थ रहना पसन किया।

लेखक राम चंद्र-Ram Chandra
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 178
Pdf साइज़15.9 MB
Categoryइतिहास(History)

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