विश्वामित्र | Vishvamitra

विश्वामित्र | Vishvamitra Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

क्या हुआ है ? किसी प्रकार भी आ नहीं रहा है मुह के पास । (पात्र लेकर मुँह से लगाता है। सोते-सोते पैर हिलाता है । ) अच्छा, मैं झटपट चलू नहीं तो प्रजीगर्त भाग जाएगा । वेग से पैर हिलाता है ।) आज इस धरती को क्या हो गया है ?

कहाँ चली गई ? पैर को लगाती ही नहीं । कैसी विचित्र बात हो गई है ! ऐं (पेर रोककर चारों ओर देखता है ।) पूर्णिमा की रात भी कभी-कभी अन्धकारपूर्ण हो जाती है । प्यास लगी है तो भी पात्र निकट नहीं प्रातः ।

चलना चाहता हूँ पर बरती निकट नहीं आती। वह क्या हो गया है ? (चन्द्रमा की ओर देख कर) क्या हुआ ? वह देखो, चन्द्रमा विचित्र ढंग से सामने खड़ा है । मेरे पैर घरती पर नहीं हैं, किन्तु बादल पर है और सामने यह गोल टोल खड़ा है।

इसीलिए मेरे पर नहीं दिखाई देते । (पेट की ओर देख कर) यह टीला कहाँ देखा था ? (हेस, देता है।) अरे हाँ, स्मरण पाया । यह तो मेरा पेट है ! हसता है । ) दो दस्यु धीरे-धीरे बातें करते हुए आते हैं। वह सुनता है ।)

=-दूस री ओर से किसी का स्वर सुनाई पड़ता है (चारों और देख कर) हः हः हः हः- मैं तो गड्ढे में पड़ा हुआ हूँ। (बड़़े परिश्रम से बैठता है और हंसता हुआ विचार करता है कोन बात करता है ! यह तो शाम्बर का स्वर बोल रहा है।

कबर के गढ़ में पडे-पे वहा की लडकियों मुझे पहचानते नहीं ? डरते हो क्या ? मैं इन्द्र और उग्रकाल दोनों को काँख में दबाये घूमता हूँ। शम्बर और दिवोदास दोनों को गोद में खिलाकर बड़ा किया है, विश्वरथ और शाम्बरी तो मेरे कहे बिना पानी तक नहीं पीते । विश्व रथ ने प्रार्या बना डाला ?

लेखक कन्हैयालाल मुंशी-Kanaiyalal Munshi
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 112
Pdf साइज़6.3 MB
Categoryआत्मकथा(Biography)

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