वराह पुराण | Varah Puran PDF In Hindi

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वराह पुराण गीता प्रेस – Varah Puran Book/Pustak Pdf Free Download

श्रीवराहपुराणकी प्रशस्ति

सर्वस्यापि च शास्त्रस्य कर्मणो वापि कस्यचित् । यावत्प्रयोजनं नोक्तं तावत्तत्केन गृह्यताम् ॥

सभी शास्त्रो और किसी भी कर्मके लिये आवश्यक है कि उसका प्रयोजन कहा जाय- ऐसा करनेपर ही उसकी उपादेयता होती है ।

यह वराहपुराण, महाप्रलयके जलौघसे उद्धृत माता पृथिवीसे भगवान् वराह-वपुधारी श्रीविष्णुके द्वारा प्रत्यक्षतः कथित होनेसे साक्षात् ‘भगवत्-शास्त्र’ है । इसकी महिमा अनूठी है ।

यहाँ प्रकृत पुराण ( वराहपुराण ) के २१७ वें अध्यायके १२वें श्लोकसे २४वें इलोकतक मूल पाठ ‘फलश्रुति’ के रूपमें पाठ करने हेतु दिया जा रहा है|

हमारे शास्त्रो में पुराणोकी बड़ी महिमा है। उन्हें साक्षात् श्रीहरिका रूप बताया गया है । जिस प्रकार सम्पूर्ण जगत्को आलोकित करनेके लिये भगवान् सूर्यरूपमे प्रकट होकर हमारे बाहरी अन्धकारको नष्ट करते हैं, उसी प्रकार हमारे हृदयान्धकार-भीतरी अन्धकारको दूर करने के लिये श्रीहरि ही पुराण-विग्रह धारण करते हैं ।

जिस प्रकार चैवर्णिको के लिये वेढोका स्वाध्याय नित्य करनेकी विधि है, उसी प्रकार पुराणोका श्रवण भी सबको नित्य करना चाहिये-‘पुराणं शृणुयान्नित्यम् ।’

पुराणोमे अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष― चारोका बहुत ही सुन्दर निरूपण हुआ है और चारोका एक-दूसरेके साथ क्या सम्बन्ध है— इसे भी भलीभाँति समझाया गया है।

श्रीमद्भागवतमें लिखा है “इतिहास और पुराण भी मन्त्र-मूलक तथा अर्थवाद मूलक होनेके कारण प्रमाण ही हैं, अतः उपर्युक्त रीतिसे ये देवता-विग्रह आदिके सिद्ध करनेमें समर्थ होते हैं।

देवताओंका प्रत्यक्ष आदि भी सम्भव है । इस समय हमें जो प्रत्यक्ष नहीं होते, प्राचीन लोगोंको वे प्रत्यक्ष होते थे, जैसे व्यासादि मुनियोंके देवताओंके साथ प्रत्यक्ष व्यवहारकी बात स्मृतिमें मिलती है।

आजकलकी ही भाँति प्राचीन पुरुष भी देवताओंके साथ प्रत्यक्ष व्यवहार करनेमें असमर्थ थे, यह कहनेवाला तो मानो जगत्‌की विचित्रता का ही प्रतिषेध करना चाहता है।

वह तो यह भी कह सकता है कि-‘आजकलके ही समान पूर्व समयमें भी सार्वभौम क्षत्रियोकी सत्ता न थी पर ऐसा कहनेपर तो फिर ‘राजसूय’ आदि विधिका भी वाव हो जायगा और ऐसा मानना पडेगा कि ‘आजकलके समान ही

वराहः कल्याणं वितरतु स वः कल्पविरमे विनिर्धुन्वन्नौदन्वनमुदकमुर्वीमुदवद्दन् खुराघातत्रुट्यत् कुलशिखरिक्कूटप्रविलुटञ् शिलाकोटि स्फोटस्फुटघटितमाङ्गल्यपटहः

भगवान वराह की पूजा एवं आराधना

वराहपुराण (अध्याय १२७-२८ ) के दीक्षासूत्रमें सात्त्विक ‘गणान्तिका दीक्षा’ की विधि निर्दिष्ट है, पर वहाँ भगवान् वराहकी सरळ पूजाविधि एवं मन्त्रादि नहीं हैं । वैसे दीक्षा एवं मन्त्रपर ‘अथातो दीक्षा कस्य’ से ‘गोपथ ब्राह्मण’ आदि वैदिक ग्रन्थोंमें भी पर्याप्त सामग्री है, पर इन्हें यहाँ अन्य पुराणों एवं आगमों के अनुसार यज्ञ वराहविष्णुकी आराधनाकी विधि देनेका प्रयत्न किया जा रहा है। पूजा आराधनाके पूर्व दीक्षा आवश्यक है । धातुपाठमें ‘दीक्ष’-* धातु बह्वर्थक है और १।६०१ पर पठित है । जैसे ‘अव’ धातुके २१-२२ अर्थ हैं, वैसे ही इसके भी ५-६

भगवान् वराहके प्रति पृथ्वीका प्रश्न और भगवान्‌के उदरमें विश्वब्रह्माण्डका दर्शनकर भयभीत हुई पृथ्वीद्वारा उनकी स्तुति

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥

नमस्तस्मै वराहाय लीलयोद्धरते महीम् । खुरमध्यगतो यस्य मेरुः खणखणायते ॥

दंष्ट्राग्रेणोद्धता गौरुदधिपरिवृता पर्वतैर्निम्नगाभिः साकं मृत्पिण्डवत्प्राग्बृहदुरुवपुषाऽनन्तरूपेण येन ।

सोऽयं कंसासुरारिर्मुरनरकदशास्यान्तकृत्सर्वसंस्थ कृष्णो विष्णुः सुरेशो नुदतु मम रिपूनादिदेवो वराहः ॥

अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् वराह, नररत्न नरऋषि, उनकी लीला प्रकट करनेवाली भगवती सरस्वती और उसके वक्ता भगवान् व्यासको नमस्कार करके आसुरी सम्पत्तियोंका नाश करके अन्तःकरणपर विजय प्राप्त करानेवाले वराहपुराणका पाठ करना चाहिये।

अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् वराह, नररत्न नरऋपि, उनकी लीला प्रकट करनेवाली भगवती सरखती और उसके वक्ता भगवान् व्यासको नमस्कार करके आसुरी सम्पत्तियोंका नाश करके अन्तःकरणपर विजय प्राप्त करानेवाले वराहपुराणका पाठ करना चाहिये ।

जिनके लीलापूर्वक पृथ्वीका उद्धार करते समय उनके खुरोंमें फँसकर सुमेरु पर्वत खन-खन शब्द करता है, उन भगवान् वराहको नमस्कार है ।

जिन अनन्तरूप भगवान् विष्णुने प्राचीन कालमें समुद्रोंसे घिरी, वन-पर्वत एव नदियोंसहित पृथ्वीको अत्यन्त विशाल शरीरके द्वारा अपनी दाढके अग्रभागपर मिट्टीके ( छोटे-से ) ढेलेकी भाँति उठा लिया था, वे कंस, मुर, नरक तथा रावण आदि असुरोंका अन्त

द्वारा करनेवाले कृष्ण एवं विष्णुरूपसे सबमे व्याप्त देवदेवेश्वर ही ज आदिदेव भगवान् वराह मेरी सभी बाधाओ ( काम, मुझे क्रोध, लोभ आदि आध्यात्मिक शत्रुओं )को नष्ट करे । क्षत्रिय सूतजी कहते हैं-पूर्वकालमे जव सर्वव्यापी

सूतजी कहते हैं—पूर्वकालमें जब सर्वव्यापी भगवान् नारायणने वराह-रूप धारण करके अपनी शक्तिद्वारा एकार्णवकी अनन्त जलराशिमें निमग्न पृथ्वीका उद्धार किया, उस समय पृथ्वीने उनसे पूछा।

पृथ्वीने कहा-प्रभो! आप प्रत्येक कल्पमें सृष्टिके आदिकालमें इसी प्रकार मेरा उद्धार करते रहते हैं; परंतु केशव ! आपके स्वरूप एवं सृष्टिके प्रारम्भके विषयमें मैं आजतक न जान सकी।

जब वेद लुप्त हो गये थे, उस समय आप मत्स्यरूप धारण कर समुद्रमें प्रविष्ट हो गये थे और वहाँसे वेदोंका उद्धार करके आपने ब्रह्माको दे दिया था।

मधुसूदन ! इसके अतिरिक्त जब देवता और दानव एकत्र होकर समुद्रका मन्थन करने लगे, तब आपने कच्छपावतार ग्रहण करके मन्दराचल पर्वतको धारण किया था।

भगवन्! आप सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हैं। जब मैं जलमें डूब रही थी, तब आपने रसातलसे, जहाँ सब ओर जल-ही जल था, अपनी एक दाढ़पर रखकर मेरा उद्धार किया है।

इसके अतिरिक्त जब वरदानके प्रभावसे हिरण्यकशिपुको असीम अभिमान हो गया था और वह पृथ्वीपर भाँति-भाँतिके उपद्रव करने लगा था, उस समय वह आपके द्वारा ही मारा गया था।

देवाधिदेव! प्राचीन कालमें आपने ही जमदग्निनन्दन परशुरामके रूपमें अवतीर्ण होकर मुझे क्षत्रियरहित कर दिया था।

भगवन्! आपने क्षत्रियकुलमें दाशरथि श्रीरामके रूपमें अवतीर्ण होकर क्षत्रियोचित पराक्रमसे रावणको नष्ट कर दिया था तथा वामनरूपसे आपने ही बलिको बाँधा था।

प्रभो! मुझे जलसे ऊपर उठाकर आप सृष्टिकी रचना किस प्रकार करते हैं तथा इसका क्या कारण है? आपकी इन लीलाओंके रहस्यको मैं कुछ भी नहीं जानती।

विभो ! मुझे एक बार जलके ऊपर स्थापित करनेके अनन्तर आप किस प्रकार सृष्टिके पालनकी व्यवस्था करते हैं? आपके निरन्तर सुलभ रहनेका कौन-सा उपाय है ?

सृष्टिका किस प्रकार आरम्भ और अवसान होता है? चारों युगोंकी गणनाका कौन-सा प्रकार है तथा युगोंका क्रम किस प्रकार चलता है ?

जब ब्रह्माजीने प्रजापालक ‘आदिराजम्के पदपर अभियेक ‘उन वराह भगवान्की जय हो, जिन्होने समुद्रके अन्तस्तकमे चिरम्र रहनेपर भी उस (समुद्र)को ऑंतोक समान सॉपोके साथ बलपूर्वक पृथ्वीको उसमेसे ऊपर निकाल लिया था ।

दानोतन प्राप केकी शाखाओमे यद्यपि भगवान्के अन्य अवतारोक भी सुस्पष्ट मुल प्राप्त है, तथारि इनमे पामन एवं राह-अवतारोका विशेष वर्णन उपलब्ध होता है ।

लेखक Vedvyas, Gita Press
भाषा हिन्दी, Sanskrit
कुल पृष्ठ 84
Pdf साइज़6.1 MB
CategoryReligious

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वराह पुराण का सारांश(Varah Puran Summary PDF)

गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित

वराह पुराण संक्षिप्त – Varah Puran Book/Pustak Pdf Free Download

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