श्री उड़िया बाबा जी के संस्मरण भाग 1,2 | Shri Udiya Baba Ji Ke Sansmaran Bhag 1,2

श्री उड़िया बाबा जी के संस्मरण भाग 1,2 | Shri Udiya Baba Ji Ke Sansmaran Bhag 1,2 Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

मै बिना किसीसे कुछ कहे चल दिया और यमुनोत्तरी होता हुधा गंगोत्तरी पहुंचा। वहाँ रात्रि मे, स्वप्नमे मकरवाहिनी भगवती मागीरथी श्रीगंगाजीने दर्शन दिया और कहा, “बेटा ! घबराम्रो मत । तुम्हें महाराजजीके दर्शन अवश्य होगे ।”

यह कह कर वे अन्तर्धान हो गयी और मेरी निद्रा खुल गयी । प्रात काल होनेपर में गंगातटकी एक विसापर बैठकर ध्यान करने लगा । थोड़ी देरमे सुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि वहाँका स्थान नहीं है. श्रीवृन्दावन का प्राश्रम है ।

श्रीमहाराजजी प्रर्धपद्मासनसे बैठे है थौर में उनके चरणोपर सिर रखकर कह रहा हूँ, “महाराजजी ! मुझे मत छोड़िये ।” वे कह रहे हैं, “तुमने मेरे पास रहकर क्या नही सीखा है ?

देखो, में तो स्वस्थ हूँ, प्रसन्न हूँ, सदा तुम्हारे पास ही हूँ मर रहूँगा भी । तुम्हारे सामने जो घटनाएँ हुई हैं. वह सव तो माया का खेल था । तुम दुःख मत मानो । जब में तुम्हारा रक्षक सवंदा तुम्हारे पास हूँ तो फिर चिन्ता क्यों करते हो ?”

इसके पञ्चात् आँखो के सामनेका दृश्य बदल गया । देखता हूँ कि वही गंगातट है, मे शिलापर बैठा हुआ हूँ और नीचे श्रीगंगाजी कलरव करती तीव्र वेगसे वह रही है । इस घटनासे मनमे हर्प और विपाद दोनो हुए।

श्रीमहारानजीके वाक्योंको स्मरण करके उठा और निवासस्थानपर आया । यह स्पष्ट अनुभूति यात्रामें महीनों मानस नेत्रोके सामने नाचती रही । श्राज भी उस घटनाका स्मरण करके हृदय भर आता है ।

एक बार अनूपशहर के पास अवन्तिका देवीके स् पर मे इस संकल्पसे कि भगवतीके दर्शन होते है या नहीं, रात्रि भर मन्दिरमें बैठा रहा । प्रातः काल मन्दिरमें ही शवासनसे लेट गया । निद्रा आगयी । ऐसा मालूम हुआ कि कोई भी कह रही है, “तुम भी तो श्रीमहाराजजीकी प्राज्ञाका पालन नहीं करते। “

लेखक सनातन देव-Sanatan Dev
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 445
Pdf साइज़13.6 MB
Categoryसाहित्य(Literature)

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