स्वामी रामतीर्थजी की जीवन चरित्र | Swami Ramtirthji Ka Jivan Charitra

स्वामी रामतीर्थजी की जीवन चरित्र | Swami Ramtirthji Ka Jivan Charitra Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

राशीम उसी में, जिसमें वेरी रहा है।यो यो भी बाहना है, और वो भी बाहवा है॥ दोहा-जिन कानों में गाई थो, अब की करुण पुकार । उन फानों में राम की, पहुँची यह फनकार ।।

अब भी अपने भक्तों के दुख, जाकर भगवान मिटाते हैं। श्रद्धा से उनका ध्यान करो, तो नंगे पाँव धाते हैं ॥ जब राम ने म में गदगद हो, निज प्रश्न भेंट चढ़ाए हैं।

सब मोटूमल हलवाई ने, आ ऐसे वचन सुनाए हैं । हे नाथ, दास हम आपके हैं, बस इतनी कृपा कोजिएगा। प्रार्थना मेरी इस वर्ष आप मेरे यहाँ भोजन कीजिएगा ॥

दोहा-तीर्थ राम महराज को, गई बात यह भाय ।

मंडू के गृह जायकर, रोटी लेते खाय ॥ गर्ता-इस प्रकार रामतीर्थजी की प्रार्थना ईश्वर में सुन ली, और मंडूमन हलवाई के यहाँ रोटी खाने व रहने का प्रयंध हो गया ।

इसके अलावा कॉलेज के प्रोफ़ेसरों ने उन्हें धीरज दिया, और गणित के प्रोफेसर गिलवर्टसन साहब ने फीस देना स्वीकार किया ।दोहा-: I- इस प्रकार सबने दिया, ढांढस उन्हें बंधाया ।

पुनः पी० ए० में राम को, भरती दिया कराय ॥अवकी मरतबा रामजी, पढ़ने में श्रति श्रम करते थे । पर शरीर अब कुछ रुग्ण हुआ, अस्वस्थ रहा वह करते थे ॥

एक समय प्रिंसिपल साहब ने, इनको अपने द्विग बुनवाया। और मीठी-मीठी बातें करके, एक पैकेट इनको दिखलाया ॥ साथ ही वह गुरु-मन मा ये, ईश्वर – आराधन करते थे ।

आज कल की तरह नहीं, सेनीमा-थेटर लखते थे। यदि समय कभी मिल जाता तो, एकान्तबास वह करते थे ॥ अथवा अपने साथियों को, वह पाठ पढ़ाया करते थे।

या कृष्णचन्द्र की लीला को, अक्सर वह गाया करते थे ॥ दोहा- प्रकार पढ़ते रहे, कौतुक किये नवीन । गणित-शास्त्र में हो गये, राम बहुत प्रवीण ॥ कभी एक क्षण को नहीं, जाने देते व्यर्थ ।

लेखक लक्ष्मीनारायण-Laxminarayan
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 41
Pdf साइज़1 MB
Categoryआत्मकथा(Biography)

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