सुखी जीवन | Sukhi Jeewan

सुखी जीवन | Sukhi Jeewan Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

सुमति हर समय उदास रहा करती थी। किसी काममें उसका मन नहीं लगता था। न किसीसे अधिक बात करती और न दूसरों की बातें सुनना चाहती। बस, उसे रात-दिन रोते रहना ही सुहाता था।

सुमतिके पिता बड़े बुद्धिमान्, विचारशील और धर्मात्मा पुरुष थे। उन्होंने सुमतिका दिल बहलाये रखनेके लिये सारे गृहकार्य उसे ही सौंप दिये थे। बच्चोंकी देख-रेख,

लड़कियोंको कसीदा सिखाना और रसोई बनाना इत्यादि सब काम वे सुमतिसे या उसको देख-रेखमें ही करवाते थे। सुमति भी बड़ी सुशील और विचारशील थी।

वह अपना धर्म समझकर सब कार्योंको ठीक-ठीक निभाती। गाँवके स्त्री-पुरुष, छोटे-बड़े सभी सुमतिकी बड़ाई करते थे। कहा करते ‘सुमति बड़ी अच्छी लड़की है, सब करती है।

कोई कहता, ‘रसोई बहुत स्वादिष्ट बनाता है। कोई कहता, इसका कसीदा तो देखने ही योग्य होता है।’सुमति भी सबको खुश रखनेका ही यत्न करती थी। वह अपने मानसिक दुःखको हृदयमें छिपाये रखती।

जिस समय फुरसत पाती एकान्तमें धरतीपर लेटकर आँचलसे अपना मुँह ढककर रोने लगती। सुमति इस बातका बहुत ध्यान रखती थी कि उसे कोई रोती न देख ले,

परन्तु उसकी भराई आँखें नहीं छिपती, उसे उदास उदास देखकर बुआ, दादी, भाभी आदि सभीकी आँखों में आँसू आ जाते। जब सुमति अपने दुःखसे दूसरोंको दुःखी देखती तो सोचने लगती –

ऐसे जीवनसे क्या लाभ, जो अपने दुःखसे दूसरोंको भी दुःखी कारे? धिक्कार है ऐसे जीवनको! मैं पृथ्वीका भार हो रही हूँ! हाय! इस संसार में सुख कहाँ है? मुझे तो संसार सूना और दुःखरूप ही जान पड़ता है।

इस दुःखभरे जीवनसे क्या लाभ? इस प्रकार जीवित रहनेका क्या प्रयोजन? हे मृत्यु ! आ, शीघ्र मुझे अपनी गोदमें सुला ले ! मैं एक क्षण भी जीना नहीं चाहती। मैं अब नाममात्रका भोजन करूँगी।

लेखक मैत्री देवी-Maitri Devi
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 183
Pdf साइज़17.5 MB
Categoryकहानियाँ(Story)

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