शम्बर कन्या | Shambar Kanya PDF

शम्बर कन्या | Shambar Kanya Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

पकड़ो। हाँ, हुमा क्या? मैंने हाथ जोड़ र वावना की–ह भगवती | मैं पापका मिथ्या होने का इ है । मुझे न साथ लेती चाहिए । जयन्त चौर जाबाल-फिर ? অন-(विवय भाव से ) फिर मूखों । उस देवी तुल्य महर्षि बेष्ठ ने उदितमान सूर्य के स्वर्ंविध्य बैसे धोठों से मयूर की भाँति कृकती हुई अमृत-सी वाणी में कहा,

देवो वल्य ? बड़ी तपस्या करनी होगी । मैने कहा कि दुरईदमन का पुत्र तपश्चर्या से किसी भी दिन पीछे नहीं हटा है। जीगरत-फिर उन्होंने क्या कहा ऋक्ष-उन्होंने कहा, तो वस्न ! तुम बड़ी प्रसन्नता से मेरे माय चल सकते हो ।

অजीगर्त-(सिग्नतावूर्व क) बड़े भाग्यवान हो तुम, भाई! मैंने कहा नहीं था कि तुम देवों के बड़े लाडले हो? शम्बर जब इसे उहा ले गया तो साथ ही मुझे क्यों नहीं लेता चला गया !जपन्त तृत्सु-(सहसा सड़े होकर) में भी चल रहा हूँ। धरभी याज्ञा लेकर पाता हूँ।

अजीगतं-पौर मैंने भी यही निश्चय कर लिया। (प्रतोप भरत और गय तृस्नु क्रोध में भरे हुए पाते हैं। प्रतीष की कटि पर करयाल भूल रही है। गय के कन्धे पर बाणों से भरा तूणीर है दोनों में झड़ हो रही है। उनके माने पर यढ़ु बेठे हुए पांवों उपक्ति रडे होकर उनसे लिपट जाते हैं और दूर सेलते हुए लोग भी सेल छोड़कर धीरे-धीरे जुट जाते हैं।

गय तृत्मु(विकताते हुए) कल सूोदप से पहले यदि विवरण उस शाम्बरी को नहीं सौंप देता है तो सबक लेना, उसे पीर उसके साथियों को दिला दिया जायेगा कि सृस्पुयों की मुजात्रों में कितना बल है ।

प्रतीय भरत-(क्रोध में) चल चल ! भरत लोग न होते तो तुम करते ‘क्या, पत्थर…? और हमारे कौशिक न होते तो जानते हो तुम्हारा क्या होता ? तुम्हारा वह दुःसाहस कि तुम उनका अपमान करो ?

लेखक कन्हैयालाल मुंशी-Kanaiyalal Munshi
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 76
Pdf साइज़3.1 MB
Categoryनाटक(Drama)

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