संगीत राग दर्शन | Sangeet Raag Darshan PDF

संगीत राग दर्शन – Raag Book Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

यह राग बिलावल थाट से उत्पन्न होता है। इसमें दोनों निपाद का प्रयोग होता है और शेप स्वर शुद्ध लगते हैं ।

शुद्ध निपार का प्रयोग आरोह अवरोह दोनों में होता है, पर कोमल निपाद का प्रयोग अवरोह में धैवत के साथ होता है-वनिक्षण। इस राग की जाति पाडव-संपूर्ण मानी जाती है आरोह में मध्यम अञ्च होता है ।

यहूदा आरोह में निपान और अवरोह में गंधार बक होता है। बादी स्वर धैवत और संवानी गंधार । गाने का समय प्रातः काल का प्रथम प्रहर शुद्ध बिलावल में सब स्वर शुद्ध लगते हैं।

कोमल निपाट के प्रयोग से ही अल्हैया बिलावल होता है । प्रचार में अलहिया बिलावल ही अधिक गाया जाता है ।

प्रश्न ही श्याम अब दुर्बत ही देख जन मटहि पट मपट कर गज बचायो। गोपही ग्वाल को राख लियो गिरिषर इन्द् को मान हिन में पटायो ।।

नरहरी रूपधर वरहि सब परिहरो दास प्रहाद पर था नमायो ।। चक्रधर दास हरि प्रेम के वश भये गोपिथर चोर के दूध पायो । विहाग को प्रचार में बिलावल थाट का मानते हैं।

इसको अधिकतर दो मध्यम और अन्य स्वर शुद्ध लगाकर गाया जाता है। कुछ गुणीजन विहाग सव शुद्ध स्वरों से भी गाते हैं।

तीव्र मध्यम का प्रयोग पहले तो विवादी के नाते से आरंभ हुआ है, परंतु अब वह राग का एक आवश्यक अंग बन गया है।

और इसीलिये कुछ लोग इसे कल्याण थाट का मानने लगे है आरोह में रिषभ और धैवत स्वर वर्जित है। अवरोह संपूर्ण है।

जाति प्रोडव-संपूर्ण। अवरोह में भी शुभ और वैवत का प्रमाण अल्प है। तीन मध्यम का प्रयोग विशिष्ट प्रकार से होता है,

जैसे-‘प,मग,मग;’ ‘धप मपग, मग’ । शुद्ध मध्यम का प्रयोग रोहावरोह में है वादी स्वर गंधार और संवादी निषाद है आरोह निषाद से आरंभ करते हैं. जैसे :-*नि साग, मग’ । गाने का समय रात का दूसरा प्रहर है।

लेखक वसंत वामन-Vasant Vaman
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 237
Pdf साइज़11.8 MB
CategoryMusic

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