रति विलास | Rati Vilash

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पुस्तक का एक मशीनी अंश

ग्रंथकर्त्री की भूमिका

  1. पहला प्रकरण-व्यापक उदासी
  2. दूसरा प्रकरण दुर्लभ सन्तोप
  3. तीसरा प्रकरण-अतिशय “पुंस्त्व”
  4. चौया प्रकरण—ठीक से कम मैथुन-सामध्य रखने वाले पति
  5. पाँचव प्रकरण– कच्ची चरण
  6. छठा प्रकरण-ठंडी मार्या
  7. सातवों प्रकरण-बाजीकरण ओषधियों ? बूढ़े से जवान बना देना ?
  8. आठवाँ प्रकरण-संभोग के बाद का सुख
  9. नयाँ प्रकरण- -मैथुन कितनी बार करना चाहिए
  10. दसवाँ प्रकरण-स्त्रियों में परिवर्तन”
  11. ग्यारहवा प्रकरण पुरुषों में “परिवर्तन”
  12. बारहवों प्रकरण दूसरी सुहाग रात
  13. परिशिष्ट–नामर्द को मर्द और संतानहीन स्त्री-पुरुषों को सन्तानवान बनाने के अमोघ नुसखे

“विवाह का रूपान्तर करने की आवश्यकता है, क्योंकि इसके इर्द गिर्द की प्रत्येक वस्तु रूपान्तरित हो चुकी है ” – फिनोट

प्रत्येक सबा प्रेमी चाहता है कि प्रेम स्थायी हो । तरुण प्रेमियों और प्रेमिकाओं में यह विश्वास पानी से और अपने आप बढ़ने लगता है कि उन का नवीन अनुराग अपने सौन्दर्य की दृष्टि से ही अपूर्व नहीं,

वरन वह शाश्वत और स्वयं जीवन से भी अधिक स्थायी है । यद्यपि नगरों के नित्य बढ़ने वाले विस्तार और सभ्य समाज की व्यक्तिगत विशेषताओं के कारण आज भी युवक और युवतियों को योग्य वधू और वर प्राप्त करने में बड़ी कठिनाई होती है,

तो भी अधिकांश तरुण और वरुणियाँ स्वभावतः और स्वतः प्रेम करती हैं। मेरा ध्यान बार बार इस बात की ओर दिलाया गया है कि आपस में प्रेम रखने वाले अतोब रसिक और सममदार पति-पत्नियों के अन्तस्तल में भी न्याकुलता छिपी रहती है।

वे डरते हैं कि कोई ऐसा नियम मौजूद है जो अन्त को जरूर हमारे विरुद्ध कार्य करेगा और हमारे आपस के आकर्षण और प्रेम को नष्ट कर डालेंगा।

उन्हें आश्चर्य होता है कि उस ज्ञान की सहायता से भी, जो “विवाहित प्रेम” जैसी पुस्तकों में दिया गया है, केवल थोड़े से वर्षों के लिए ही सुख प्राप्त होता है।

समय पाकर वह क्रूर नियम ज़रूर अपना कार्य करेगा और पति-पत्नी का प्रेम घट जायगा। हम सबके लिए यह खेद की बात है कि जिन जोड़ों का पहले आपस में प्रगाढ़ प्रेम था

ये विवाह के कुछ ही वर्ष बाद केवल प्रेम-शून्य पति-पत्नी ही वन जायँ, या एक दूसरे से घृणा करना, वरन् भयभीत रहना सीख जायें । आज कल लोगों में यह विचार बहुत फैल रहा है

विवाह के कुछ ही वर्ष बाद प्राय: प्रत्येक जोड़े में पहले का सा प्रेम नहीं रहता। इसी बात को ले कर कहानियों और लेख लिखे जाते हैं। इस प्रचार का संरल हृदय लोगों पर असर पड़ता ।

मनुष्य समनने लगता है कि इस बात में कुछ न कुछ सचाई तो अवश्य होगी, निराधार तो कोई बात ठहर ही नहीं सकती। पति-पन्नी के इतने प्रगाढ़ प्रेम को नष्ट करने

वाले केवल समय के संयोग और व्याधियों नहीं हो सकतीं। क्योंकि स्थायी अनुराग की विद्यमानता में ये बाहरी बातें कुछ भी अनिष्ट नहीं कर सकतीं ।

लेखक सन्तराम-Santram
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 226
Pdf साइज़9.2 MB
Categoryसाहित्य(Literature)

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