पंचदशी ग्रन्थ | Panchadasi PDF In Hindi

पंचदशी विद्यारण्य मुनि – Panchadasi Book PDF Free Download

रामेश्वर से हिमालय तक प्रसिद्द वेदांत ग्रन्थ

कुर्वते फर्म भोगाव की कर्तुं य मुञ्जते । नयाँ कीटा बावादावर्तान्तरमाशु ते॥ अनन्तो जन्मनो जन्म समन्ते नैव निरतिम् ॥३०॥

सुखादि को भोगने के लिये तो बे कर्म करते हैं [आगे को कम करने के लिये ये भोगों को भोगते हैं । ऐसे य जीन नदी के उन कीों की तरह है जो एक आवर्त से निकलकर झट पट चूसरे आयत में ना फँसते हैं।

ऐसे ही जीव भी जन्म से जन्म को पाने रहते हैं। इन्हें कभी भी विश्राम विचा मुख नहीं मिलता।

क्योंकि सनको आत्मतत्व का अवार्य ज्ञान तो होता ही नहीं इस कारण वे लोग भोग [मुत्र आदि के अनुभव ] के लिये [मनुष्यादि शरीरों में बस कर म उन परीरों के अनुकूल कर्म किया करते हैं ।

फिर कर्म करने के लिये [मनुष्यादि शरीरों द्वारा] उन उन फलों को भोगा करते हैं ।

फल को भोगना इस- लिये आवश्यक होता है कि, यदि कर्म करने के बाद उनको फल का अनुभव न हुआ करे, तो फिर उन प्राणियों को उस तरह की इच्छा ही पैदा न हुआ करें और फिर वे पणी उन न साधनों के अनुष्ठान में भी न उगा करें।

गों जच कोई प्रानी किसी मोग को भोग लगता है तब फिर पह शतगुण उतसाव से बैसे बैडे कर्मों में जुट जाता है और जब कर्म कर चुक्ता है नप रहारों भाषाओं से भोगों की वाट देखा करता है ।

यो यह कर्म और भोग का अनन्त चमार कभी समाप्त होने में ही नदीं आता।

पेरो जीवों की गति नदी के बहाव में रहने वाले कैड़ों की सी होती है, जो कभी एक भंपर में से निकलते हैं तो तुरन्त ही दूसरे मैं जो पढ़ते हैं और कमी भी विमाम नही पाढे. है।

इसी प्रकार ये प्राणी कर्म और भोग के इस मैंवर में फैस कर जन्म से जन्म को पाते हैं। इन इतभागियों को सुख के चिरस्थायी दर्शन कभी भी नहीं होते।

उनका तात्पर्य स्पष्ट किया है और उन्होंने वेदान्त-दर्शन पर अनेक ग्रन्थ भी लिखे हैं। उनके बाद उनके शिष्यों और अनुयायियों ने भी इस दिशा में प्रयास जारी रखा।

उनकी रचनाओं में श्री विद्यारण्य स्वामी के कई ग्रन्थ बडे महत्वपुर्ण और ख्यातिप्राप्त हैं। वे भगवान् शंकराचार्य द्वारा स्थापित श्रृंगेरिमठ के आचार्य पद पर सन् १३७७ से १३८६ तक आसीन रहे।

वे वेद-भाष्य रचयिता श्री सायण के भाई थे और स्वयं भी बड़े विद्वान थे। उन्होने पञ्चदशी, सर्वदर्शन्-संग्रह, श्री शंकर दिग्विजय. जीवन-मुक्ति विवेक. अनुभूति प्रकाश, विवरण प्रमेय संग्रह, उपनिषद् दीपिका आदि कई ग्रन्थ लिखे हैं।

इग्दश्य विवेक पुस्तक के रचयिता भगवान् शंकराचार्य हैं अथवा विद्यारण्य स्वामी. इस विषय में विवाद है। श्री विद्यारण्य स्वामी की अन्य सभी रचनाओं की अपेक्षा पञ्चदशी अधिक लोकप्रिय हुई है।

इसमें अद्वैत वेदान्त का निरुपण क्रमबद्ध, स्पष्ट और सविस्तार हुआ है। यद्यपि इसमें विरोधी मतों के खण्डन का प्रयास नहीं किया गया है फिर भी प्रतिपाय विषय को स्पष्ट करने के लिए उनमें दोष अवश्य दिखाये गये हैं।

यन्य का मुख्य उद्देश्य वेदान्त में रुचि रखने वाले व्यक्तियों को उसका सुखपूर्वक सम्यक् ज्ञान कराना ही है। लेखक ने इस विषय का प्रमाण उपनिषद् माना है. इसलिए मन्त्रों को उद्धृत करने में कोई संकोच नहीं किया गया है।

तर्क उपनिषद् सत्य का अनुगामी रहा है। अनुभव प्राप्त करना उसका अन्तिम प्रमाण है। उसके साथ वेदान्त ज्ञान का फल जुड़ा हुआ है। ब्रह्म और आत्मा के एकत्व ज्ञान के में ही , मुक्ति और की उपलब्धि है।

हमारे समस्त दुःखों का अज्ञान के कारण ही हम अपने सत्स्वरुप को भुलकर असत् शरीर आदि को ही अपना रूप मान बैठे हैं। देहात्मबुध्दि के कारण हम विकारी, मरणधर्मा और क्षुद्र बन गये।

लेखक विद्यारण्य मुनि-Vidyaranya Muni
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 726
Pdf साइज़20 MB
Categoryधार्मिक(Religious)

विद्यारण्य मुनि द्वारा रचित पंचदशी की दूसरी किताब PDF

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