नव दुर्गा चैत्र नवरात्रि व्रत कथा | Nava Durga PDF in Hindi

श्री नव दुर्गा नवरात्रि व्रत कथा – Navratri PDF Free Download

१- शैलपुत्री

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम् ॥

माँ दुर्गा अपने पहले स्वरूपमें ‘शैलपुत्री के नामसे जानी जाती हैं। पर्वतराज हिमालयके वहाँ पुत्रीके रूपमें उत्पन्न होनेके कारण इनका यह ‘शैलपुत्री’ नाम पड़ा था। वृषभ-स्थिता इन माताजीके दाहिने हाथमें त्रिशूल और बायें हाथमें कमल पुष्प सुशोभित है। यही नव दुर्गाओंमें प्रथम दुर्गा हैं। अपने पूर्वजन्ममें ये प्रजापति दक्षकी कन्याके रूपमें उत्पन्न हुई थीं।

तब इनका नाम ‘सती’ था । इनका विवाह भगवान् शङ्करजीसे हुआ था। एक बार प्रजापति दक्षने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया। इसमें उन्होंने सारे देवताओंको अपना-अपना यज्ञ-भाग प्राप्त करनेके लिये निमन्त्रित किया।

किन्तु शङ्करजीको उन्होंने इस यज्ञमें निमन्त्रित नहीं किया। सतीने जब सुना कि हमारे पिता एक अत्यन्त विशाल यज्ञका अनुष्ठान कर रहे हैं, तब वहाँ जानेके लिये उनका मन विकल हो उठा। अपनी यह इच्छा उन्होंने शङ्करजीको बतायी। सारी बातोंपर विचार करनेके बाद उन्होंने कहा- “प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं।

२- ब्रह्मचारिणी

करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा ॥

माँ दुर्गाकी नव शक्तियोंका दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणीका है। यहाँ ‘ब्रह्म’ शब्दका अर्थ तपस्या है। ब्रह्मचारिणी अर्थात् तपकी चारिणी–तपका आचरण करनेवाली। कहा भी है – वेदस्तत्त्वं तपो ब्रह्म – वेद, तत्त्व और तप ‘ब्रह्म’ शब्दके अर्थ हैं।

ब्रह्मचारिणी देवीका स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यन्त भव्य है। इनके दाहिने हाथमें जपकी माला एवं बायें हाथमें कमण्डलु रहता है।

अपने पूर्वजन्ममें जब ये हिमालयके घर पुत्री- रूपमें उत्पन्न हुई थीं तब नारदके उपदेशसे इन्होंने भगवान् शङ्करजीको पति-रूपमें प्राप्त करनेके लिये अत्यन्त कठिन तपस्या की थी। इसी दुष्कर तपस्याके कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात् ब्रह्मचारिणी नामसे अभिहित किया गया। एक हजार वर्ष उन्होंने केवल फल-मूल खाकर व्यतीत किये थे।

३-चन्द्रघण्टा

पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता । प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता ॥

माँ दुर्गाजीकी तीसरी शक्तिका नाम ‘चन्द्रघण्टा’ है। नवरात्रि उपासनामें तीसरे दिन इन्हींके विग्रहका पूजन-आराधन किया जाता है। इनका यह स्वरूप परम शान्तिदायक और कल्याणकारी है।

इनके मस्तकमें घण्टेके आकारका अर्धचन्द्र है, इसी कारणसे इन्हें चन्द्रघण्टा देवी कहा जाता है। इनके शरीरका रंग स्वर्णके समान चमकीला है। इनके दस हाथ हैं।

इनके दसों हाथोंमें खड्ग आदि शस्त्र तथा बाण आदि अस्त्र विभूषित हैं। इनका वाहन सिंह है। इनकी मुद्रा युद्धके लिये उद्यत रहनेकी होती है। इनके घण्टेकी-सी भयानक चण्डध्वनिसे अत्याचारी दानव-दैत्य-राक्षस सदैव प्रकम्पित रहते हैं।

४-कूष्माण्डा

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ॥

माँ दुर्गाजीके चौथे स्वरूपका नाम कूष्माण्डा है। अपनी मन्द, हलकी हँसीद्वारा अण्ड अर्थात् ब्रह्माण्डको उत्पन्न करनेके कारण इन्हें कूष्माण्डा देवीके नामसे अभिहित किया गया है।

जब सृष्टिका अस्तित्व नहीं था, चारों ओर अन्धकार-ही अन्धकार परिव्याप्त था, तब इन्हीं देवीने अपने ‘ईषत्’ हास्यसे ब्रह्माण्डकी रचना की थी। अतः यही सृष्टिकी आदि-स्वरूपा, आदि शक्ति हैं। इनके पूर्व ब्रह्माण्डका अस्तित्व था ही नहीं ।

५-स्कन्दमाता

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया । शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी ।।

माँ दुर्गाजीके पाँचवें स्वरूपको स्कन्दमाताके नामसे जाना जाता है। ये भगवान् स्कन्द ‘कुमार कार्तिकेय’ नामसे भी जाने जाते हैं। ये प्रसिद्ध देवासुर संग्राममें देवताओंके सेनापति बने थे।

पुराणों में इन्हें कुमार और शक्तिधर कहकर इनकी महिमाका वर्णन किया गया है। इनका वाहन मयूर है। अतः इन्हें मयूरवाहनके नामसे भी अभिहित किया गया है।

इन्हीं भगवान् स्कन्दकी माता होनेके कारण माँ दुर्गाजीके इस पाँचवें स्वरूपको स्कन्दमाताके नामसे जाना जाता है। इनकी उपासना नवरात्रि-पूजाके पाँचवें दिन की जाती है।

६-कात्यायनी

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी ॥

माँ दुर्गाके छठवें स्वरूपका नाम कात्यायनी है। इनका कात्यायनी नाम पड़नेकी कथा इस प्रकार है-कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे। उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए। इन्हीं कात्यके गोत्रमें विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे।

इन्होंने भगवती पराम्बाकी उपासना करते हुए बहुत वर्षोंतक बड़ी कठिन तपस्या की थी। उनकी इच्छा थी कि माँ भगवती उनके घर पुत्रीके रूपमें जन्म लें। माँ भगवतीने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली थी।

७-कालरात्रि

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता । लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी ॥

वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी ॥

माँ दुर्गाजीकी सातवीं शक्ति कालरात्रिके नामसे जानी जाती हैं। इनके शरीरका रंग घने अन्धकारकी तरह एकदम काला है। सिरके बाल बिखरे हुए हैं। गलेमें विद्युत्की तरह चमकनेवाली माला है।

इनके तीन नेत्र हैं। ये तीनों नेत्र ब्रह्माण्डके सदृश गोल हैं। इनसे विद्युत्के समान चमकीली किरणें निःसृत होती रहती हैं। इनकी नासिकाके श्वास प्रश्वाससे अग्निकी भयङ्कर ज्वालाएँ निकलती रहती हैं।

इनका वाहन गर्दभ – गदहा है। ऊपर उठे हुए दाहिने हाथकी वरमुद्रासे सभीको वर प्रदान करती हैं। दाहिनी तरफका नीचेवाला हाथ अभयमुद्रामें है। बायीं तरफके ऊपरवाले हाथमें लोहेका काँटा तथा नीचेवाले हाथमें खड्ग (कटार) है।

८-महागौरी

समारूढा श्वेताम्बरधरा श्वेते वृषे शुचिः । महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा ॥

माँ दुर्गाजीकी आठवीं शक्तिका नाम महागौरी है। इनका वर्ण पूर्णतः गौर है। इस गौरताकी उपमा शङ्ख, चन्द्र और कुन्दके फूलसे दी गयी है। इनकी आयु आठ वर्षकी मानी गयी है— ‘अष्टवर्षा भवेद् गौरी’।

इनके समस्त वस्त्र एवं आभूषण आदि भी श्वेत हैं। इनकी चार भुजाएँ हैं। इनका वाहन वृषभ है। इनके ऊपरके दाहिने हाथमें अभय-मुद्रा और नीचेवाले दाहिने हाथमें त्रिशूल है। ऊपरवाले बायें हाथमें डमरू और नीचेके बायें हाथमें वर मुद्रा है। इनकी मुद्रा अत्यन्त शान्त है ।

९- सिद्धिदात्री

सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ॥

माँ दुर्गाजीकी नवीं शक्तिका नाम सिद्धिदात्री है। ये सभी प्रकारकी सिद्धियोंको देनेवाली हैं। मार्कण्डेयपुराणके अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व – ये आठ सिद्धियाँ होती हैं। ब्रह्मवैवर्त्तपुराणके श्रीकृष्ण जन्मखण्डमें यह संख्या अट्ठारह बतायी गयी है। इनके नाम इस प्रकार हैं

नवरात्रि में नौ रंगों का महत्व

नवरात्रि के समय हर दिन का एक रंग तय होता है. मान्यता है कि इन रंगों का उपयोग करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है.

प्रतिपदा- पीला

द्वितीया- हरा

तृतीया- भूरा

चतुर्थी- नारंगी

पंचमी- सफेद

षष्टी- लाल

सप्तमी- नीला

अष्टमी- गुलाबी

नवमी- बैंगनी

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भाषा हिन्दी
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CategoryVrat Katha

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