माँ अन्नपूर्णा व्रत कथा, पूजाविधि और आरती | Annapurna Vrat Katha In Hindi

अन्नपूर्णा व्रत कथा | Maa Annapurna Vrat Katha Book/Pustak PDF Free Download

माँ अन्नपूर्णा व्रत कथा

माता अन्नपूर्णा का 21 दिवसीय यह व्रत अत्यन्त चमत्कारी फल देने वाला है। यह व्रत (अगहन) मार्गशीर्ष मास में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू कर 21 दिनों तक किया जाता है।

इस व्रत में अगर व्रत न कर सकें तो एक समय भोजन करके भी व्रत का पालन किया जा सकता है।

इस व्रत में सुबह घी का दीपक जला कर माता अन्नपूर्णा की कथा पढ़ें और भोग लगाएं ।

अन्नपूर्ण सदापूर्ण शंकर प्राण वल्लभे ।

ज्ञान वैराग्य सिध्यर्थ भिक्षां देहि च पार्वति।।

माता च पार्वति देवी पिता देवो महेश्वरः ।

बान्धवा शिव भक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् ।

एक समय की बात है। काशी निवासी धनंजय की पत्नी का नाम सुलक्षणा था। उसे अन्य सब सुख प्राप्त थे, केवल निर्धनता ही उसके दुःख का कारण थी। यह दुःख उसे हर समय सताता था।

एक दिन सुलक्षणा पति से बोली- स्वामी! आप कुछ उद्यम करो तो काम चले। इस प्रकार कब तक काम चलेगा ?

सुलक्षण्णा की बात धनंजय के मन में बैठ और वह उसी दिन विश्वनाथ शंकर जी को प्रसन्न करने के लिए बैठ गया और कहने लगा- हे देवाधिदेव विश्वेश्वर! मुझे पूजा-पाठ कुछ आता नहीं है, केवल तुम्हारे भरोसे बैठा हूँ।

इतनी विनती करके वह दो-तीन दिन भूखा-प्यासा बैठा रहा। यह देखकर भगवान शंकर ने उसके कान में ‘अन्नपूर्णा ! अन्नपूर्णा !! अन्नपूर्णा !!!’ इस प्रकार तीन बार कहा ।

यह कौन, क्या कह गया ? इसी सोच में धनंजय पड़ गया कि मन्दिर से आते ब्राह्मणों को देखकर पूछने लगा- पंडितजी! अन्नपूर्णा कौन है ?

ब्राह्मणों ने कहा- तू अन्न छोड़ बैठा है, सो तुझे अन्न की ही बात सूझती है जा घर जाकर अन्न ग्रहण कर धनंजय घर गया स्त्री से सारी बात कही, वह बोली- नाथ! चिंता मत करो, स्वयं शंकरजी ने यह मंत्र दिया है। वे स्वयं ही खुलासा करेंगे। आप फिरजाकर उनकी आराधना करो ।

धनंजय फिर जैसा का तैसा पूजा में बैठ गया। रात्रि में शंकर जी ने आज्ञा दी। कहा- तू पूर्व दिशा में चला जा। वह अन्नपूर्णा का नाम जपता जाता और रास्ते में फल खाता, झरनों का पानी पीता जाता। इस प्रकार कितने ही दिनों तक चलता गया।

वहां उसे चांदी सी चमकती बन की शोभा देखने में आई । सुन्दर सरोवर देखने में या, उसके किनारे कितनी ही अप्सराएं झुण्ड बनाए बैठीं थीं। एक कथा कहती थीं। और सब ‘मां अन्नपूर्णा’ इस प्रकार बार-बार कहती थीं।

यह अगहन मास की उजेली रात्रि थी और आज से ही व्रत का ए आरम्भ था। जिस शब्द की खोज करने वह निकला था, वह उसे वहां सुनने को मिला।

धनंजय नें उनके पास जाकर पूछा- हे देवियो। आप यह क्या करती हो? उन सबने कहा हम सब मां अन्नपूर्णा का व्रत करती हैं।

व्रत करने से क्या होता है? यह किसी ने किया भी है? इसे कब किया जाए? कैसा व्रत है और कैसी विधि है? मुझसे भी कहो।

वे कहने लगीं- इस व्रत को सब कोईकर सकते हैं। इक्कीस दिन तक के लिए 21 गांठ का सूत लेना चाहिए। 21 दिन यदि न बनें तो एक दिन उपवास करें, यह भी न बनें तो केवलकथा सुनकर प्रसाद लें।

निराहार रहकर कथा कहें, कथा सुनने वाला कोई न मिले तो पीपल के पत्तों को रख सुपारी या घृत कुमारी (गुवारपाठ) वृक्ष को सामने कर दीपक को साक्षी कर सूर्य, गाय, तुलसी या महादेव को बिना कथा सुनाए मुख में दाना न डालें।

यदि भूल से कुछ पड़ जाए तो एक दिवस फिर उपवास करें व्रत के दिन क्रोध न करें और झूठ न बोलें।

धनंजय बोला- इस व्रत के करने से क्या होगा ? वे कहने लगीं- इसके करने से अन्धों को नेत्र मिले, लूलों को हाथ मिले, निर्धन के घर धन आए, बांझी को संतान मिले, मूर्ख को विद्या आए, जो जिस कामना से व्रत करे, मां उसकी इच्छा पूरी करती है।

वह कहने लगा बहिनों! मेरे भी धन नहीं है, विद्या नहीं है, कुछ भी तो नहीं है, मैं तो दुखिया ब्राह्मण हूँ, मुझे इस व्रत का सूत दोगी? हां भाई तेरा कल्याण हो, तुझे देंगी, ले इस व्रत का मंगलसूत ले।

धनंजय ने व्रत किया। व्रत पूरा हुआ, तभी सरोवर में से 21 खण्ड की सुवर्ण सीढ़ी हीरा मोती जड़ी हुई प्रकट हुई। थनंजय जय ‘अन्नपूर्णा’ ‘अन्नपूर्णा’ कहता जाता था।

इस प्रकार कितनी ही सीढियां उतर गया तो क्या देखता है कि करोड़ों सूर्य से प्रकाशमान अन्नपूर्णा का मन्दिर है, उसके सामने सुवर्ण सिंघासन पर माता अन्नपूर्णा विराजमान हैं।

सामने भिक्षा हेतु शंकर भगवान खड़े हैं। देवांगनाएं चंवर डुलाती हैं। कितनी ही हथियार बांधे पहरा देती हैं। धनंजय दौड़कर जगदम्बा के चरणों में गिर गया।

देवी उसके मन का क्लेश जान गई। धनंजय कहने लगा माता! आप तो अन्तर्यामिनी हो। आपको अपनी दशा क्या बताऊँ ?

माता बोली मेरा व्रत किया है, जा संसार तेरा सत्कार करेगा। माता ने धनंजय की जिहवा परबीज मंत्र लिख दिया। अब तो उसके रोम-रोम में विद्या प्रकट हो गई।

इतने में क्या देखता है कि वह काशी विश्वनाथ के मन्दिर में खड़ा है। मां का वरदान ले धनंजय घर आया। सुलक्षणा से सब बात कही। माता जी की कृपा से उसके घर में सम्पत्ति उमड़ने लगी। छोटा सा घर बहुत बड़ा गिना जाने लगा।

जैसे शहद के छत्ते में मक्खियां जमा होती हैं, उसी प्रकार अनेक सगे सम्बंधी आकर उसकी बड़ाई करने लगे। कहने लगे-इतना धन और इतना बड़ा घर, सुन्दर संतान नहीं तो इस कमाई का कौन भोग करेगा?

सुलक्षणा से संतान नहीं है, इसलिए तुम दूसरा विवाह करो । अनिच्छा होते हुए भी धनंजय को दूसरा विवाह करना पड़ा और सती सुलक्षणा को सौत का दुःख उठाना पड़ा ।

इस प्रकार दिन बीतते गय फिर अगहन मास आया। नये बंधन से बंधे पति से सुलक्षणा ने कहलाया कि हम व्रत के प्रभाव से सुखी हुए हैं। इस कारण यह व्रत छोड़ना नहीं चाहिए । यह माता जी का प्रताप है। जो हम इतने सम्पन्न और सुखी हैं।

सुलक्षणा की बात सुन धनंजय उसके यहां आया और व्रत में बैठ गया। नयी बहू को इस व्रत की खबर नहीं थी। वह धनंजय के आने की राह देख रही थी।

दिन बीतते गये और व्रत पूर्ण होने में तीन दिवस बाकी थे कि नयी बहू को खबर पड़ी। उसके मन में ईर्ष्या की ज्वाला दहक रही थी। सुलक्षणा के घर आ पहुँची और उसने वहां भगदड़ मचा दी। वह धनंजय को अपने साथ ले गई।

नये घर में धनंजय को थोड़ी देर के लिए निद्रा ने आ दबाया। इसी समय नई बहू ने उसका व्रत का सूत तोड़कर आग में फेंक दिया।

अब तो माताजी का कोप जाग गया। घर में अकस्मांत आग लग गई, सब कुछ जलकर खाक हो गया। सुलक्षणा जान गई और पति को फिर अपने घर ले आई। नई बहू रूठ कर पिता के घर जा बैठी।

पति को परमेश्वर मानने वाली सुलक्षणा बोली- नाथ! घबराना नहीं माता जी की कृपा अलौकिक है। पुत्र कुपुत्र हो जाता है पर माता कुमाता नहीं होती। अब आप श्रद्धा और भक्ति से आराधना शुरू करो। वे जरूर हमारा कल्याण करेगी।

धनंजय फिर माता के पीछे पड़ गया। फिर वहीं सरोवर सीढ़ी प्रकट हुई, उसमें मां अन्नपूर्णा’ कहकर वह उतर गया। वहां जा माता जी के चरणों में रुदन करने लगा।

माता प्रसन्न हो बोली- यह मेरी स्वर्ण की मूर्ति ले, उसकी पूजा करना, तू फिर सुखी हो जायेगा, जा तुझे मेराआशीर्वाद है तेरी स्त्री सुलक्षणा ने श्रद्धा से मेरा व्रत किया है, उसे मैने पुत्र दिया है।

धनंजय ने आँखें खोली तो खुद को काशी विश्वनाथ के मन्दिर में खड़ा पाया। वहां से फिर उसी प्रकार घर को आया इधर सुलक्षणा के दिन चढ़े और महीने पूरे होते ही पुत्र का जन्म हुआ।

गांव में आश्चर्य की लहर दौड़ गई। मानता आने लगा। इस प्रकार उसी गांव के निःसंतान सेठ के पुत्र होने पर उसने माता अन्नपूर्णा का मन्दिर बनवा दिया, उसमें माता जी धूमधाम से पधारी, यज्ञ किया और धनंजय को मन्दिर के आचार्य का पद दे दिया।

जीविका के लिए मन्दिर की दक्षिणा और रहने के लिए बड़ा सुन्दर सा भवन दिया। धनंजय स्त्री-पुत्र सहित वहां रहने लगा। माता जी की चढ़ावे में भरपूर आमदनी होने लगी।

उधर नई बहू के पिता के घर डाका पड़ा, सब लुट गया, वे भीख मांगकर पेट भरने लगे। सुलक्षणा ने यह सुना तो उन्हें बुला भेजा, अलग घर में रख लिया और उनके अन्न-वस्त्र का प्रबंध कर दिया।

धनंजय, सुलक्षणा और उसका पुत्र माता जी की कृपा से आनन्द से रहने लगे। माता जी ने जैसे इनके भण्डार भरे वैसे सबके भण्डार भरें।

लेखक लोक संस्कृति
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 9
PDF साइज़0.18 MB
Categoryव्रतकथाएँ

अन्नपूर्णा जंयती का पर्व

माँ अन्नपूर्णा अन्न की देवी मानी जाती हैं। जो धन धान्य की देवी है। अन्नपूर्णा देवी की पूजा करने से कभी भी किसी चीज़ की कमी नही होती तथा अन्न के भंडार भरे रहते हैं।

माँ अन्नपूर्णा जयंती का पर्व मार्गशीष शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस दिन माँ अन्नपूर्णा की पूजा की जाती है। मां अन्नपूर्ण की पूजा करने से घर में कभी धन और धान्य की कमी नही होती। अन्नपूर्ण जयंती के दिन अन्न का दान करने से भी विशेष लाभ मिलता है।

अन्नपूर्णा व्रत पूजा विधि

पूजा सामग्री:- माता अन्नपूर्णा की मूर्ति, रेशम का डोरा, रोली, चंदन, धूप, दूर्वा, अक्षत, धान के पौधे( सत्रहवें दिन के लिये), सत्रह प्रकार के पकवान ( सत्रहवें दिन के लिये), सत्रह पात्र, दीप, घी, लाल वस्त्र, जल पात्र, नैवेद्य, लाल पुष्प, लाल पुष्पमाला

  • इस व्रत को सब कोईकर सकते हैं। इक्कीस दिन तक के लिए 21 गांठ का सूत लेना चाहिए। 21 दिन यदि न बनें तो एक दिन उपवास करें, यह भी न बनें तो केवलकथा सुनकर प्रसाद लें।
  • निराहार रहकर कथा कहें, कथा सुनने वाला कोई न मिले तो पीपल के पत्तों को रख सुपारी या घृत कुमारी (गुवारपाठ) वृक्ष को सामने कर दीपक को साक्षी कर सूर्य, गाय, तुलसी या महादेव को बिना कथा सुनाए मुख में दाना न डालें।
  • यदि भूल से कुछ पड़ जाए तो एक दिवस फिर उपवास करें व्रत के दिन क्रोध न करें और झूठ न बोलें।
  • अन्नपूर्णा जयंती के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर नित्यक्रम से निवर्त होकर स्नान इत्यादि कर साफ़ वस्त्र धारण करे |
  • सूर्य को जल अर्पित कर व्रत और पूजा का संकल्प लें |
  • अन्नपूर्णा माता के पूजा स्थल को साफ कर गंगाजल का छिड़काव कर लें |
  • अन्नपूर्णा जयंती के दिन स्नान से पूर्व रसोईघर की अच्छे से सफाई कर लें और गंगाजल व गुलाबजल का छिड़काव करें |
  • अब जिस चूल्हे पर आपको भोजन बनाना है उस पर हल्दी, कुमकुम, चावल, पुष्प, धूप और दीपक से पूजन करे |
  • इसके बाद मां अन्नापूर्णा की प्रतिमा या तस्वीर को किसी चौकी पर स्थापित कर एक सूत का धागा लेकर उसमें 17 गांठे लगा लें | और उस धागे पर चंदन और कुमकुम लगाकर मां अन्नापूर्णा की तस्वीर के समक्ष रख दें |
  • इसके बाद 10 दूर्वा और 10 अक्षत अर्पित करें |
  • अब मां अन्नापूर्णा की धूप व दीप आदि से विधिवत पूजा करें और अन्नापूर्णा माता से प्रार्थना करें कि, हे मां मुझे धन, धान्य, पशु पुत्र, आरोग्यता ,यश आदि सभी कुछ दें |
  • इसके बाद पुरुष इस धागे को दाएं हाथ की कलाई पर और महिला इस धागे को बाएं हाथ की कलाई पर पहन लें |
  • माँ अन्नापूर्णा को प्रसाद का भोग लगाएं और 17 हरे धान के चावल और 16 दूर्वा लेकर मां अन्नापूर्णा की प्रार्थना करें और कहें, हे आप तो सर्वशक्तिमयी हैं, इसलिए सर्वपुष्पयी ये दूर्वा आपको समर्पित है |
  • इसके बाद किसी निर्धन व्यक्ति या ब्राह्मण को अन्न का दान अवश्य करें |

अन्नपूर्णा माता की आरती

बारम्बार प्रणाम, मैया बारम्बार प्रणाम।

जो नहीं ध्यावे तुम्हें अम्बिके,कहां उसे विश्राम।
अन्नपूर्णा देवी नाम तिहारे,लेते होत सब काम॥

मैया बारम्बार प्रणाम।

प्रलय युगान्तर और जन्मान्तर,कालान्तर तक नाम।
सुर सुरों की रचना करती,कहाँ कृष्ण कहाँ राम॥

मैया बारम्बार प्रणाम।

चूमहि चरण चतुर चतुरानन,चारु चक्रधरश्याम।
चन्द्र चूड़ चन्द्रानन चाकर,शोभा लखहि ललाम

मैया बारम्बार प्रणाम।

देवी देव दयनीय दशा में,दया दया तव नाम।
त्राहि-त्राहि शरणागत वत्सल,शरण रूप तव धाम॥

मैया बारम्बार प्रणाम।

श्रीं, ह्रीं, श्रद्धा, श्रीं ऐं विद्या,श्रीं क्लीं कमल काम।
कान्तिभ्रांतिमयी कांति शांतिमयी वर देतु निष्काम॥

 बारम्बार प्रणाम, मैया बारम्बार प्रणाम।

अन्नपूर्णा व्रत और जयंती का महत्व

अन्नपूर्णा जयंती मागर्शीष मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि के दिन मनाई जाती है। इस पर्व का बड़ा महत्व होता है।

जब पृथ्वी पर लोगों के पास खाने के लिए कुछ नही था तो मां पार्वती ने अन्नपूर्णा का रुप रखकर पृथ्वी को इस संकट से निकाला था। अन्नपूर्णा जयंती का दिन मनुष्य के जीवन में अन्न के महत्व को दर्शाता है।

इस दिन रसोई की सफाई और अन्न का सदुपयोग बहुत जरूरी होता है। इससे घर मे शुधी आती है। माना जाता है कि इस दिन रसोई की सफाई करने और अन्न का सदुपयोग करने से मनुष्य के जीवन में कभी भी धन धान्य की कमी नही होती।

इसके करने से अन्धों को नेत्र मिले, लूलों को हाथ मिले, निर्धन के घर धन आए, बांझी को संतान मिले, मूर्ख को विद्या आए, जो जिस कामना से व्रत करे, मां उसकी इच्छा पूरी करती है।

अन्नपूर्णा जयंती पूजा का शुभ मुहूर्त 2022

माँ अन्नपूर्णा को प्रसन्न करने के लिए शुभ समय में पूजन-पाठ करना चाहिए है और पुरे विधि विधान से माँ अन्नपूर्णा की कथा व पूजा करनी चाहिए |

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