हिंदी लोक साहित्य | Lok Sahitya PDF In Hindi

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लोक साहित्य – Lok Sahitya Book PDF Free Download

लोक साहित्य क्या है? और उसके फायदे

लोक-साहित्य फोकलोर का एक अग है जिसके अंतर्गत लोकगीत, लोककथा, लोकगाथा, लोक-नाट्य और लोकोक्ति आदि आते है ।

आवश्यकता से अधिक सभ्य और आधुनिक लोग यह मान सकते हैं कि लोक-साहित्य अशिष्ट, असभ्य और गवाँर लोगो का साहित्य है, कि वह महत्त्वहीन है और उसका नोटिस नही लिया जाना चाहिए ।

इस मान्यता का अर्थ है जीवन की सहज गति की उपेक्षा और परम्परा की अवहेलना । – लोक मे जो व्याप्त है, वह लोक का ही है । उसकी रक्षा सबका ही दायित्व है, यह वोध आये बिना न तो लोकतत्र सुरक्षित है, न लोक-साहित्य, न लोक-संस्कृति और न लोक-कला ।

जिन देशों में औद्योगीकरण और नगरीकरण ने सहज जीवन-धारा को कृत्रिमता की ओर मोड दिया है वहाँ लोक की उपेक्षा हुई और हो रही है । वहाँ लोक-साहित्य भी मात्र परम्परा का अवशेष वनकर रह गया है ।

हमारे यहाँ भी जीवन की कृत्रिमताओ ने लोक-साहित्य के प्रवाह को अवरुद्ध किया है लेकिन अव भी लोकवाणी द्वारा सचरित बहुत कुछ है, जिसे सकलित कर लेना हमारे लिए हितकर होगा ।

लोकसाहित्य लोकजीवन की अभिव्यक्ति है वह जीवन से घनिष्टता से संबंधित है। लोकसाहित्य एक पारिभाषिक शब्द है जो लोक तथा साहित्य से मिलकर बना है।

लोक शब्द आंरंभिक साहित्य में वेद के साथ भी मिलता है। लोक वेद की चर्चा भी सुनी जाती है किन्तु वेद में कही गई बात वैदिक और लोक में कही बात लौकिक होती है।

इस प्रकार सारी पौराणिक कथाएं वैदिक और वेद से भिन्न सारी कथाएं लौकिक कहलाएंगी। वास्तव में लोकसाहित्य शब्द अंग्रेजी के फोकलिटरेचर (Folk Literatur) का अनुवाद है ।

सामान्य प्रयोग में पाश्चात्य प्रणाली की सभ्यता के लिए ऐसे शब्दों जैसे लोकवाता (Folklore), लोकसंगीत ( Folk Music) आदि में इसका अर्थ संकुचित होकर अंचलीय तथा मुख्य धारा से कटे ग्रामीण संस्कृति के लिये प्रयोग में लाया जाता है।

‘लोक’ मनुष्य समाज का वह वर्ग है जो अभिजात्य संस्कार शास्त्रीयता और पण्डित्य की चेतना अथवा अहंकार से शून्य और जो एक परम्परा के प्रवाह में जीवित रहता है।

ऐसे लोक की अभिव्यक्ति में जो तत्व मिलते हैं वे लोक तत्व कहलाते हैं अंग्रेजी में थ्वसा सवअम का पर्याय लोकवार्ता को माना जाता है। इसके पहले पापुलर एण्टीक्विटीज शब्द प्रयोग में लाया जाता था।

लोकवार्ता का प्रयोग दो अर्थों में किया जाता है- (1) लोगों की अलिखित परम्परा की सामग्री जो साहित्यिक संस्कारों से अनभिज्ञ तथा अनगढ़ होती है तथा कथा साहित्य, रिवाज, विश्वास आदि में मिलती है इस प्रकार लोकवार्ता ऐतिहासिक विज्ञान के बहुत निकट है।

इससे मनुष्य के अतीत पर प्रकाश पड़ता है और सदैव अनुमान और कल्पना के प्रयोग के अतिरिक्त उसके सिद्धीकरण के लिये वैज्ञानिक प्रक्रिया का आधार चुना जाता है। लोकवार्ता का क्षेत्र विस्तृत है।

लोकसाहित्य लोकवार्ता का पर्याय नहीं है। मराठी में इन्हें पर्याय माना जाता है।

लोकवार्ता में लोककलाएं, लोक अनुष्ठान, लोकमार्ग, तथा लोक साहित्य ( Folk arts, Folk Practices, Folk ways, Folk Literetire) सभी आते हैं।

लोकसाहित्य लोकवार्ता के अन्य भागों से पृथक नहीं है। विविध लोकगीत तथा लोक कहानियां अनुष्ठानों से संबंधित भी होती हैं। जैसे – विशेष व्रतों पर कहीं जाने वाली कहानियां । लोककला (चित्रकला) लोकनुष्ठान आदि भी इसी से संबंधित हैं। इस तरह लोक साहित्य लोकवार्ता का एक अंग ही सिद्ध होता है।

लोकसाहित्य के अंतर्गत वे समस्त बोली या भाषागत अभिव्यक्ति आती हैं जिसमें आदिम संस्कृति के अवशेष हों ।परम्परागत मौखिक कम से उपलब्ध बोली तथा भाषागत अभिव्यक्ति हो तथा जिसे श्रुति माना जाता हो।

जो लोकमानस की प्रवृत्ति में समाई हो तथा जिसका रचनाकाल तथा कृतिकार स्पष्ट न हो । ऐसे साहित्य को किसी विशेष कृतिकार से नहीं जोड़ा जा सकता।

कृतित्व को किसी व्यक्तित्व के साथ संबद्ध करके भी लोक स्वयं का माने तथा वह लोकमानस द्वारा सामान्यतः स्वीकार्य हो ।

लोकतत्व की चर्चा करते समय उसके विविध पर्व दिखाई देते हैं।

लोक साहित्य का आशय

वैदिक काल से ‘लोक’ शब्द प्रचलित है। ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में यह शब्द आया है। वैदिक काल में ही वेद और लोक शब्दावली अपनी-अपनी पृथक सत्ता स्पष्ट कर देती है।

पाणिनि ने वे और लोक शब्दों के भिन्न-भिन्न स्वरूपों का बोध कराया है। नाट्य शास्त्रकार भरतमुनि नाट्यधर्मी और लोकधर्मी प्रवृत्तियों को भिन्न बताते उनका उल्लेख करते हैं।

महाभारत में व्यास जी स्पष्ट कर देते हैं कि प्रत्यक्षदर्शी लोक ही सारे विश्व को सर्वप्रकार से देखने वाला होता है, ‘प्रत्यक्षदर्शी लोकानां सर्वदर्शी भवेन्तरः । ‘ इसी प्रकार गीता (15-18) में भी वेद और लोक का महत्व अलग-अलग प्रतिपादित किया गया है, ‘अतोऽअस्मि लोके वेदे च प्रचितः पुरुषोत्तमः ।’

भारतीय चिन्तन में ‘लोक’ शब्द के तात्पर्य को संगत रूप से स्पष्ट करने वाला एक अन्य शब्द ‘जन’ है।

‘जन’ का प्रयोग अथर्ववेद के पृथिवी सूक्त में देखा जा सकता है। ‘जनं विभ्रति बहुया विवाचसं । नाना धर्माणं पृथिवी यथोकसम् ।

यही मानव मात्र की और इंगित करने वाला ‘जन’ शब्द, सम्राट अशोक के सप्तम और अष्टम शिलालेखों में स्थान पाता है। जहां सम्राट जनपदवासियों से सम्पर्क करने निकलता है।

यह जन’ उस साम्राज्य के सारे निवासी हैं जो नगर, ग्राम आदि में बसते हैं। इन विवेचन से यह निष्कर्ष सहज में ही निकलता है कि लोक और जन का अर्थ सारे निवासियों से है जो कहीं भी बसते हों।

लोक कृतिकार

यह भ्रान्त धारणा घर कर गई है कि लोक रचनाओं का कोई रचनाकार नहीं होकर, वह रचना लोकरचित होती है। इस सृजन की ऊहापोह का समाधान भी आवश्यक है।

लोकरचना का सृजक कोई समूह नहीं हो सकता। भावोन्माद में आकर कोई सृजक अपनी अनुभूति शब्दों अथवा प्रदर्शन द्वारा व्यक्त करता है।

वह अनुभूति स्वाभाविक, सहज और अहैतुकी होने पर लोकसमूह द्वारा अपना ली जाती है, तब वह सृजन, लोकमानस की अभिव्यक्ति बन जाता है।

उसका उत्स व सृजक विस्मृत हो जाते हैं और सारा लोकसमुदाय उसे अंगीकार कर एवं पूर्णरूपेण अपनत्व प्रदान कर, सृजक के स्थान पर आ बैठता है।

आरम्भ में जो व्यक्तिपरक रचना रही थी वह फिर लोकमुख में स्थान पाकर सर्वजनीन बन जाती है। फिर युग प्रवाह में वह रचना बहती रहती है वाचिक परम्परा के कारण उसके अंग संवर्धन द्वारा पुष्ट होते हैं तो उसके शुष्क अंश टूट भी गिरते हैं।

लोकानुभूति और लोकाभिव्यक्ति के कारण वह रचना सदैव हरी रहती है। अपने इन गुणों के कारण वह इतनी सक्षम होती है कि लोक मानस का अटूट अंग बन जाती है। उसके चिंतन में वह एकाकार हो जाती है।

लोक तत्व

लोकसमुदाय का एक मानस होता है। वह अपनी रूचि अथवा व्यवहार में आदिम, जंगली अथवा ऐन्द्रिक नहीं होता है।

वह तो गतिशील तथा जीवंत समूह के कार्यकलापों को संचालित करता है। उसमें सहज विवेक एवं मंगल की भावना भी रहती है। वह अनायास ही, अनजाने अपना परिष्कार करता रहता है।

लेखक
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 323
PDF साइज़15 MB
CategoryLiteature
Source/Creditsloksahitya.weebly.com

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