गुप्त धन उपन्यास | Gupt Dhan Novel By Premchand

गुप्त धन | Gupt Dhan Book/Pustak PDF Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

पुत्र प्रेम

बाबू चैतन्यदास ने अर्थशास्त्र खूब पड़ा था, और केवल पड़ा ही नहीं था, उसका यथायोग्य व्यवहार भी वे करते थे। वे वकील थे, दो-तीन गांवों में उनकी जमीदारी भी थी, बैंक में भी कुछ रुपये थे।

यह सब उसी अर्थशास्त्र के ज्ञान का फल था। जब कोई खर्च सामने आता तब उनके मन में स्वभावत. प्रश्न होता था- इससे स्वय मेरा उपकार होगा या किसी अन्य पुरुष का ?

यदि दो मे से किसी का कुछ भी उप कार न होता तो वे बड़ी निर्दयता से उस खर्च का गला दबा देते थे। ‘पर्य’ को वे विष के समान समझते थे। अर्थशास्त्र के सिद्धान्त उनके जीवन स्तम्भ हो गये थे।

बाबू साहब के दो पुत्र थे। बड़े का नाम प्रभुदास था, छोटे का शिवदास । दोनो कालेज में पढते थे। उनमें केवल एक श्रेणी का अन्तर था।

दोनों ही चतुर, होनहार युवक थे। किन्तु प्रभुदास पर पिता का स्नेह अधिक था। उसमें सदुत्साह् की मात्रा अधिक थी और पिता को उसकी जात से बड़ी-बड़ी आशाएँ थी।

वे उसे विद्योन्नति के लिए इंग्लैण्ड भेजना चाहते थे। उसे बैरिस्टर बनाना उनके जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा थी।

इज्ज़त का खून

मैने कहानियो और इतिहासों मे तकदीर के उलट-फेर की अजीबोगरीब दास्ताने पढी है। शाह को भिखमगा और मिलमगे को शाह बनते देखा है।

तकदीर एक छुपा हुआ भेद है। गलियो मे टुकड़े चुनती हुई औरते सोने के सिहासन पर बैठ गयी है और वह ऐश्वर्य के मतवाले जिनके इशारे पर तकदीर भी सर झुकाती थी, आन की आन मे चील-कौओं का शिकार बन गये है।

पर मेरे सर पर जो कुछ बीती उसकी नजीर कही नहीं मिलती। आह, उन घटनाओं को आज याद करती हूँ तो रोगटे खडे हो जाते है और हैरत होती है कि अब तक मैं क्यों और क्योंकर जिन्दा हूँ।

सौन्दर्य लालसाओ का स्रोत है। मेरे दिल में क्या-क्या लालसाएँ नयी पर आह, निष्ठुर भाग्य के हाथों मर मिटी। मै क्या जानती थी कि वही आदमी जो मेरी एक-एक अदा पर कुर्बान होता था, एक दिन मुझे इस तरह जलील और बर्बाद करेगा।

लेखक प्रेमचंद-Premchand
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 277
Pdf साइज़20.6 MB
Categoryउपन्यास(Novel)

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