भारतीय सामाजिक विचारधारा | Bhartiya Samajik Vichardhara

भारतीय सामाजिक विचारधारा | Bhartiya Samajik Vichardhara Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

“क्रोध न करना, सत्य बोलना, घन को बॉट र गोगना क्षमा- भाव रखना, अपनी ही पत्नी के गर्भ से संतान पैदा करना, बाहर-मीतर से पवित्र रहना, किसी से द्रोह न करना, खरल भाव रखना और भरण-पोषण के योग्य व्यक्तियों का पालन करना।”

ये धर्म प्रत्येक मनुष्य के लिये आवश्यक बताये गये हैं ये किसी भी समाज के श्रेष्ठ निर्माण के लिये अत्यंत आवश्यक हैं। जहां तक इन गुरणों का प्रश्न है, 1. भारतीय धर्म में कोई विशेषता नहीं है। ये गुण प्रायः सभी धर्मों में मानव मात्, के लिये अपेक्षित और अनिवार्य है

इनके प्राधार पर ही सामाजिक मर्यादाओं का पालन संभव है साथ ही सामाजिक कल्याण का मूल भी इन व्यक्तिगत गुणों के आधार पर ही विकसित होता है। यदि ये गुण व्यक्तियों में न हों तो समाज-व्यवस्था का चलना ही दुष्कर हा जाय । लेकिन हिन्दू-धर्म की विशेषता इसके बाद आरंभ होती है।

समाज में न केवल वणों के माध्यम से व्यक्ति का स्थान निश्चित किया गया है बल्कि एक मोर तो सामूहिक रूप से वरणों का धर्म या कर्तव्य निश्चित किया गया तो दूसरी और व्यक्ति के जीवन का क्रम इस प्रकार निश्चित किया गया

ताकि बचपन में उसकी शिक्षा-दीक्षा भली-भाँति हो सके और वह गृहस्थ जीवन को अधिक से अधिक उपयोगी बना सके। लेकिन इन सबके साथ ही जीवन के अंतिम उद्देश्य ‘ब्रह्म’ से साक्षातकार को भी नहीं मुलाया गया है उसके संबंध में भी उचित विधान है ।

परन्तु भीष्म ने द्वाह्मण-धर्म की विशेष व्याख्या की है । उहोने कहा कि ब्राह्मणों को इन्द्रिय संयम रखना चाहिये। इसे ब्राह्मणों का प्राचीन धर्म बताया गया है । इसके अतिरिक्त उन्हें सदेव वेद-शात्रों का स्वाध्याय करना चाहिये क्योंकि इसी से उनके सब कर्मों की पूर्ति हो ज

लेखक कौशल कुमार राय-Kaushal Kumar Rai
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 303
Pdf साइज़22.5 MB
Categoryविषय(Subject)

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