भगवद आराधना विधी | Bhagavad Aradhana vidhi

भगवद आराधना विधी | Bhagavad Aradhana vidhi Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

पहले आगमसिद्धान्त का नाम उपादान किया गया है । अत: वह (ईश्वरसंहिता) आगमसिद्धान्तानुसारिणी है – ऐसी भावना की जाती है। (इसी विषय को श्रीप्रश्नसंहिता को पीठिका में भी विस्तृत किया है) । ।

हाल में हमारे आन्ध्रप्रदेश में विद्यमान समग्र प्रसिद्ध वैष्णवक्षेत्रों में एवम् दक्षिणदेश में विद्यमान अनेक श्रीवैष्णवक्षेत्रों में भी आराधनापद्धति मन्त्रसिद्धान्तानुसार ही चल रही है ऐसा सब (विद्वान) परिशीलकों ने अपने अपने अभिप्राय को व्यक्त किया ।

तत्तत् आलयों की प्रतिष्ठा उसी ढंग (मन्त्रसिद्धान्त के अनुसार) से ही की गयी होगी उस का कारण आगम प्रभृति सिद्धान्त के अनुसार आराधनादियों को निर्वहण करने में श्रम ही हो सकता है ।।

मन्त्रसिद्धान्त के लिए पाद्यसंहिता ही प्रधान होने के कारण प्रयोगग्रन्थ को लिखने वाले सब महानुभावलोग ‘पाद्यसंहितोक्तविधिः’ अथवा ‘पाद्यसंहितानुसारिणी’ ऐसा अपने ग्रन्थ को व्यक्त करते हैं। यह एक आचार हो बन गया ।।

पाद्यसंहिता, नित्याराधना से लेकर प्रतिष्ठान्त तक की विधि को, उपलब्ध अनेक संहिताओं की अपेक्षा समग्र रूप से हो विवरण करतो है। यह निस्संशय है । इतना ही नहीं । इस संहिता का प्राचीनत्व आधुनिक परिशीलकलोगों के द्वारा भी स्वीकार किया जाना इस की विशेषता है ।

यह (पाद्य) संहिता मन्त्रसिद्धान्तको विवरण करने वाली अनेक संहिताओं में अन्यतम है – यह विषय अविस्मरणीय है ।।उस सिद्धान्त के अनुसार प्रयोग को तैयार करते समय उस सिद्धान्त को अनुसरण करने वाली सब संहिताओं का परिशीलन करना, उन सब में बताये गये अनुसार प्रयोग को शुद्धरूप देना अवर्जनीय एवम् आवश्यक भी है ।।

सिद्धान्तगत वैविध्य के विषय में एवम उन के सगपुरम् रङ्गभट्टाचर्यस्वामीजी ने ‘नित्यार्चनापद्धति’ नामक ग्रन्थ के व में आपाततः स्पर्श कर के छोड दिया । परन्तु कौन्ट कोन सी तायें किस किस सिद्धान्त में अन्तर्गत होती हैं इस विषय में प्रस्ताव किया । उन्हों ने एक पाद्यसंहिता को मात्र मन्त्रसिद्धान्तानुसारिणी । ऐसा उन का अभिप्राय उपोद्घात से मालूम पड़ रहा है ।।

लेखक
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 154
Pdf साइज़17.9 MB
Categoryधार्मिक(Religious)

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