बाबरनामा | Baburnama PDF In Hindi

बाबरनामा – Baburnama Book/Pustak PDF Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

बंटूण चलर दे खों मी मारी कली वाजिन ने बी आय मी के बिंदु को मार पीच की फौज के बाएं हाथ से ब लिक अली कुतजी प्रात पर चढ़कर हुत देर का लाड़ा पीर मोहम्मद अली

जंगजंग चोर उसके भाई नोरे ने पारी श्री से प्राप्त चढ़कर भाले और संडे चलाये दूसरे जिन्टू पर से बाबा सावन ने बेटे की कत मिटाने के।

वास्ते तीर मारे अकासर जबानो पे बहा रूब रूब तीरे- का राम को बेर नहीं उठाने दिया दूसरे जवान सलीम के दीर कणन की मार को रक्याल में न लाकर किने थे खोकने (सुरंग लगाने )

में लगे रहे दो पहर से पहिले ही उततर प्रर् के बीच की बुर्ष जिसकी दोस्त बेगदे आदमी सो रहे थे फाड़ दी गई और ये लोग दुश्मन

उसपर चढ़ गए और ऐसा मजबूत किला दो तान टे में फना हो गया जोड़ बाले कृति है उनके याल च पकड़े गये ३१०० हजार मे वादा आदमी मारे गये गाने ।

बादशाह किल्ले में गये कुछ देर वहां के सुल्तान नो के घरों चे वाढवत यानी पा मुल्क अन्दाजा पिता दे श्राये दरभरे दिन कृच किनके चराये ब्रह्म पर इवरे कुछ कैदियों के युनाह र्माना कलां के कहने मे बह गये और

ये मान बहजोई पदित गल्लाजा काल के गथ कर ये गये कुछ भगवान धीर फसाद जाट भी जो रा |

गये थे कनल किये गये र इनकी सिर फतेह को गोरी के साथ काबुल भेजे गये बलख, बनसा न की भी फतह नामे लिखा गया ह पनसूर पुष्प जई, न प्रमुफजई पानी को बर्फ में समाचार और दे रसके दूि दिन बुध को सुलतान बैस सुलतान लो.

गोरे मुल्तान अलाउद्दीन, को चोड़े मिलधात श्री र वासना देफर चिशकियागया श्रीराम वहां से कुछ होकर कजोड़ के सामने जैश हुमा शाह मनसूर की बेटी लशकरके लोटने सका

वहीं ढोड़ी गई बादशाह कुछ करके प्लाजा खिजर के नीचे गहरे पर्थाना कला को रुखसत दी गई भाते बाय कुगड के सवे से सलमान को भेजे गये यू सरे दिन तड़के इ स् हुआ भारी

वहां उन्होंने सज़ान (वैशाख जेट) का महीमा तेरक रके सुलतान महमूद खां के पास आदमी भेना और उसको बुलाकर फिर समर कन्द पर चढ़ाई की सुलतान महमूद अपने बेटे सुल्तान मुहम्मदखां को ५८६ हज़ार सवारों से को ड़ गया मगर शेबाखां के आने की खबर सुनकर वादशाह को फिर नाउमेदी के साथ खुजन्द में लौट आना पड़ा.

वहां से बादशाह इंदजान लेने के इरादे से ताश कंद में महमूद खां के पास मदद मांगने के वास्ते गये खान ने कुछ दिनों पीछे ७/८०० आदमी उनके साथ कर दिये बाद थाह खुजंद के पास होकर रातों रात गये और नसेनी ल गाकर वसूख का किला जो खुजंद से १० कोस पर था चोरी से लेलिया मगर साथियों ने कहा कि इस किले से क्या होता है इसलिये उसको छोड़कर खुजंद में चले

लेखक मुंशी देवीप्रसाद – Munshi Deviprasad
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 460
PDF साइज़ 30.7 MB
Category आत्मकथा(Biography)

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