याज्ञवल्क्य स्मृति | Yajnavalkya Smriti PDF In Hindi

याज्ञवल्क्य स्मृति  व्यवहार अध्याय – Yaagyavalky Smruti Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

गुरु को दक्षिणा देकर उसकी कक्षा से अथवा वेद समाप्त करके वा व्रत से पार होकर या दोनों को समाप्त करके ( समावर्तन) स्नान करे ॥ ५१ ॥ ब्रह्मचर्य से न डिगकर लक्षण- युक्त कारी असपिएह और अपने से छोटी अवस्थाचाली स्त्री को काहे ॥ ५२ ॥

अरोगिणीं भातृमतीमसमानार्षगोत्रजाम् । पश्चमात्सप्षमादूर्ध्व मातृतः पितृतस्तथा ॥ ५३॥ दशपूरुषविर्याताच्योत्रियाखां महाकुलाव् । स्फीतादपि न संचारिरोगदोषसमन्वितात् ॥५४॥

(असाध ) रोगसे हीन हो, जिसके भाई हों, अपने गोत्र और प्रवर की न हो और जो मातृकुल में पांच पीढी से ऊपर हो और पितृ मातृकुल में सात पीढ़ी से ऊपर हो उसे ब्याहे ॥ ५३ ॥

दश पुरुष से प्रसिद्ध केदपाउयों के कुल से कन्या लबे परन्तु कुष्ट श्रादि संचारी रोगयुक्त उत्तमपु ल से भी कन्या न लेव ।। ५४ ।।

एतैरेव गुणैर्युक्तः सवर्णः श्रोत्रियो वरः । यन्रात्परीक्षितः पुंस्वे युवा धीमान् जनश्रियः ॥ ५.५॥ यदुच्यते दिजातीनां शूद्राद्दारोपसंग्रहः ।न तन्मम मतं यस्मात्त्रात्मा जायते स्वयम् ॥ ५६॥

इन्हीं पूर्वोक्त गुणों से युक्त, सवर्ण, वेदपाठी, यन से निसका पुंस्त्व परीक्षित हो, युवा, बुद्धिमान और लोगों को प्रिय हो ऐसा घर होना चाहिये॥

॥४ ॥ शूद्र से कन्या लेने की अनुमति दिनों को जो कही है यह मेरा मत नहीं, क्योंकि दारा में श्रात्मा स्वयं उत्पन्न होता है ॥ ५६ ॥. तिस्रो वर्णानुपूर्वेण दे तथैका यथाक्रमम् । ब्राह्मणक्षत्रियविशां भार्या स्याच्छूद्रजन्मनः ॥ ४७ ॥ ब्राह्मों विवाह आहूय दीयते शक्नयलंकृता । तज्जः पुनात्युभयतः पुरुषानेकर्विंशातिम् ॥ ५८ ॥

वर्ण की अनुलामता से ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य के क्रम से %* तीन दो और एक स्त्रियां होती हैं। शूद्र को केवल अपनी ही वर्ण की स्त्री होती है ॥ ५७ ॥

वर को बुलाकर अपनी शक्ति के अनुसार, आभूषण सहित जो कन्यादान है उसे ब्राह्मविवाह कहते हैं ।

ऐसे व्याह से जो पुत्र उत्पन्न होता है वह अपनी ऊपर की दश और नीचे की दश और एक अपनी, याँ ३फीस पादियों को पवित्र करता है ।। ५८॥

यज्ञस्थ ऋत्विजे देव आदायार्पस्तु गोदयम् । चतुर्दश प्रथमजः पुनात्युत्तरजश्च षट् ॥ ५६ ॥ इत्युक्त्वाचरतां धर्म सह या दीयतेऽर्थिने । सकायः पाययेत्तजः पट् पट् वंश्यान् सहात्मना ६० यज्ञ करानेसले तरहस्वित् को कन्या दे तो दैवविव्इ,

लेखक गुरुप्रसादजी शास्त्री-Guruprasadji Shastri
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 246
Pdf साइज़6.2 MB
Categoryधार्मिक(Religious)

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