वैदिक सर्प विद्या | Vaidik Sarp Vidya

वैदिक सर्प विद्या | Vaidik Sarp Vidya Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

निप चिपक प्राचीन कामे इस दिलमे मे। ये बढ़े पानक होते हैं और दूरसे ही विष विशेषकर जांसमें फेंक देते हैं, इनका विष इतना प्रखर होता है कि बूरसे फैंक हुए विषसेमी प्राणी मर जाता है ।साधारणतः नाग चार हाथ लंबा होता है, परंतु बंगालके सुंदर बनमें दस बारह हाथ लंबे नाग होते हैं ।

कई केवळ दो हाथही कमे होते हैं। बंगालके नाग बड़े बलवान होते हैं, इसलिये उनको पकडनेके लिये १, १ मनुष्य आवश्यक होते हैं परंतु अन्य छोटे नागोंको एक मनुष्यमी पकड सकता है।कई कहते हैं कि, सांपों की २१ जातियां हैं, परंतु उनमें केवल चार जातीके सर्पही विषयुक्त होते हैं,

अन्य विषहीन ही होते हैं। परंतु वास्तविक बात यह कि प्रायः प्रत्येक सर्प विषयुक्त ही होता है, किसीमें थोड़ासा विष होता है और कईयोंमें प्रखर और भयानक विष होता है । जिसके विषसे मनुष्यादि प्राणी मर जाता है, उसको “विष-मय-सर्प” कहते हैं, परंतु थोडे विषवाले सर्पके दंशसे नहीं मरता इसलिये उसको निर्विष कहते हैं।

नागकी फणा के ऊपर एक प्रकारका चिन्ह बीचमें होता है, इसी जातिके कई स्थानके स्पोपर नहीं मी होता । ये ही सर्प मयानक विषसे युक्त होते हैं। सर्प जातिके बहुत प्राणी ” प्’ ” ऐसा आवाज सूक्ष्म रीतिसे करते हैं । नाग भी यह आवाज करता है,

परंतु नागजातीके सपीका खास आवाज ” फूत्कार पाठक यहां आश्चर्य न करें कि, तिरथ्धिरानी आदि शब्द अन्यत्र अन्य पदार्थोके वाचक हैं, और, यहां सर्पवाचक कैसे हो सकते हैं ! वैदिक शब्द गुणवोधक होनेके कारण जहां जहां वह गुण होता है, वहां उस शब्द का प्रयोग होता है ।

लेखक दामोदर सातवलेकर-Damodar Satwalekar
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 84
Pdf साइज़3.2 MB
Categoryविषय(Subject)

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