Sahih al-Bukhari Hindi PDF (सहीह अल-बुख़ारी हिंदी)

Sahih al-Bukhari Hindi PDF Free Download (सहीह अल-बुख़ारी मय तजुर्मा व तकसीर)

शारेह के मुख्तसर हालात और चन्द अहम गुज़ारिशात

दिल्ली से 30-40 मील दूर दक्षिण-पश्चिमी इलाके को मेवात के नाम से पुकारा जाता है जो ज़िला गुड़गांव की तह‌सील नूह व फ़िरोज़पुर झिरका और रेवाड़ी व पलौल और जिला अलवर और भरतपुर राजस्थान के अकवर हिस्सों पर मुश्तमिल (आधारित) हैं। बाशिन्दे ज़्यादातर मेव राजपूत मुसलमान हैं।

जिनका आबाई पेशा काश्तकारी है। वही इलाक़ा राक़िमुल हुरूफ़ का वतने मालूफ है। ज़िला गुड़गांव की तहसील फ़िरोज़पुर झिरका में क़स्बा पंग्वाँ के पास एक मौज़अ रहपुवा नामी नाचीज़ का मक़ामे सकूनत है। और यहीं मुख़्तसर सी बस्बेदारी है जो बच्चों के लिये ज़रिय-ए-मआश है। अल्लाहुम्म बारिकलना फ़ीमा अअतैत। आमीन !

अगरचे तक़्सीमे मुल्क की वजह से इस इलाक़े पर बहुत काफ़ी अबर पड़ा, ताहम आज भी यहाँ कि मुस्लिम आबादी कई लाख है। यहाँ तौहीद व सुत्रत की इशाअत व तब्लीग का अव्वलीन सहरा उन बुजुर्गाने क़ौम के सर पर है जो आज़ादी-ए-वतन के अव्वलीन अलमबरदार हज़रत मौलाना सय्यद अहमद साहब बरेलवी और हज़रत मौलाना इस्माईल शहीद देहलवी रहिमहुमुल्लाह जैसे पाकबाज़ बुजुर्गों के तर्बियतयाफ़्ता थे।

वो यहाँ आए और इस्लाह व सुधार के फ़राइज़ अंजाम दिये। बाद में हज़रत शैखुल कुल मौलाना सय्यद मुहम्मद नज़ीर हुसैन साहब मुहद्दिष देहलवी (रह.) के फ़ैज़याफ्ता हज़रात ने भी यहाँ काफ़ी काम किया। तक़ब्बलल्लाहु हस्नातहुम आमीन।

राक़िमुल हुरूफ़ (लेखक) का बचपन इब्तिदाई स्कूली ता’ लीम से शुरू हुआ। वालिदे माजिद (रह.) पहले ही दागे मुफ़ारक़त दे चुके (या’नी इंतक़ाल कर चुके) थे। बड़े भाई मरहूम और वालिदा मरहूमा के ज़ेरे साया ग़ालिबन 1337 हिजरी में दारुल उलूम देहली जाकर मदरसा हमीदिया सदर बाज़ार में दाखिला की सआदत हासिल हुई। उस ज़माने में ये मदरसा मुसलमान बच्चों के लिये न सिर्फ़ ता’ लीम बल्कि बेहतरीन तर्बियत व परवरिश की ख़िदमत अंजाम दे रहा था।

लायक़तरीन असातिज़ा (क़ाबिल मुदरिस) मुक़र्रर थे। और बच्चों के जुम्ला मसारिफ़ खुद रईसे अअज़म देहली हज़रत शैख हाफ़िज़ हमीदुल्लाह साहब (रह.) बर्दाश्त फ़र्माते थे। उसी दर्सगाह में कुआंन मजीद और फ़ारसी व सर्फ़ व नहव वगैरह की इब्तिदाई किताबें पढ़ीं।

बाद में मदरसा दारुल किताब वस्सुत्रह सदर देहली में हज़रत मौलाना शैख़ अब्दुल वहाब साहब सद्री (रह.) के यहाँ तक्मील करके आप ही से सनदे फ़राग़त हासिल की। ये ग़ालिबन 1346 हिजरी का ज़माना था। उन दिनों देहली फ़िल वाकेअ दारुल उलूम थी। बड़े-बड़े उलम-ए-इस्लाम यहाँ मौजूद थे और दीगर अकाबिर अतराफ़े हिन्द से आते भी रहते थे। अलहम्दुलिल्लाह अपने तहक़ीक़ी तबई रुज्हान के तहत बेशतर उलम-ए-किराम की इल्मी मजालिस से इस्तिफ़ादा के मौके हासिल हुए।

उन्हीं दिनों मदरसा सईदिया पुल बंगश भी इलमा व तलबा के लिये एक ज़बरदस्त इल्मी मर्कज़ था। जहाँ बैहूकी दौराँ हज़रत “मौलाना अबू सईद शर्कुद्दीन साहब मुहद्दिष देहलवी (रह.) का सिलसिल-ए-दर्स जारी था। आपकी सुहबत में भी हाज़िरी का मौक़ा मिला।

LanguageHindi
No. of Pages739
PDF Size100 MB
CategoryIslamic Book
Source/Credits

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