नैष्कर्म्य सिद्धि | Naishkarmya Siddhi PDF

नैष्कर्म्य सिद्धि हिंदी अनुवाद – Naishkarmya Siddhi Book/Pustak Pdf Free Download

पुस्तक का एक मशीनी अंश

अविवेकी पुरुष अविधापरवक्ष होकर दुःसके कारणमृत देहादिमें अहन्ता और ममता करता हुआ त्रिविध दुःखोंसे सन्तप्त होकर बन्म-मरण परम्परारूप संसारमें भटकता रहता है। अतः संसार महान् दुः रूप है ।

और वास्तव में यदि देखा बाय तो जीवको उस सच्चे सुख और सच्ची शान्तिकी ओर ले जानेमें कारण भी यह दुःख ही है । क्योंक इस संसारमें यदि दुःख न होता और दुःखके रहनेपर भी यदि बह हेय न होता, अर्थात् यदि वह सुखके समान प्रिय होता,

अथवा प्रिय न होनेपर भी यदि उसकी निवृत्ति नहीं हो सकती यानी दुःख यदि नित्य होता अथवा अनित्य होनेपर भी यदि उसकी नियति का कोई उपाय ही नहीं होता, या शाखसे प्रतिपाद्य उपाय उसका निवर्तक न होता, अथवा शास्त्रप्रतिपाद्य उपायसे अन्य कोई सरल उपाय उसका निवर्तक होता,

तो फिर कोई भी पुरुष सद्गुरुकी शरणमें जाकर वेदान्त बाक्योंका श्रवण ( अद्वैत ब्रामें तात्पर्य-निर्णयरूप अवण ) नहीं करता, चित्तकी शुद्धिके लिए नित्यनैमितिक कर्मोका अनुष्ठान एवं चित्तकी एकाग्रताके लिए भग वान्की उपासना भी नहीं करता ।

परन्तु ऐसी बात नहीं है। दुःख है और वे एक-दो ही नहीं, अनन्त हैं।

वे सब तीन विभागोंमें विभक्त हैं-आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक । आध्यात्मिक दुःख शारीरिक और मान सिक मे से दो प्रकारके हैं।

ज्वर, शूल, शिरोवेदना आदि रोग शारीरिक दुःख और काम, क्रोध, लोभ आदि मानसिक दुःख हैं।

सर्प, वृश्चिक, व्याप्र, चौर आदि प्राणियोंके द्वारा उत्पन्न होनेवाले दुःख आधिभौतिक कहलाते हैं एवं अग्नि, जल, विजली आदिसे जो अतिवृष्टि अनावृष्टि आदि दुःख उत्पन्न होते हैं, वे आधिदैविक कहे जात ये सब शरीरके भीतरी निमित्तोंसे उत्पन्न होनेके कारण आध्यात्मिक कहलाते हैं।

सर्प, वृश्चिक, व्याप्र, चौर आदि प्राणियोंके द्वारा उत्पन्न होनेवाले दुःख आधिभौतिक कहलाते हैं एवं अग्नि, जल, विजली आदिसे जो अतिवृष्टि अनावृष्टि आदि दुःख उत्पन्न होते हैं, वे आधिदैविक कहे जाते हैं।

लेखक सुरेश्वराचार्य- Sureshvaracharya
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 203
Pdf साइज़12 MB
Category Religious

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