कूर्म पुराण – Kurma Purana Gita Press Book Pdf Free Download

पूर्व विभाग
कूर्म (कच्छप)-रूप धारण किये हुए सर्वद्रष्टा अविनाशी भगवान् विष्णुको देखकर देवताओं तथा नारदादि महर्षियोंने उन देवकी स्तुति की ॥ २९ ॥
उसी समय नारायण भगवान् विष्णुकी प्रिया देवी श्रीलक्ष्मीका आविर्भाव हुआ। उन्हें पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुने ही ग्रहण किया।
लक्ष्मीके तेजसे मोहित हुए इन्द्रसहित नारद आदि महर्षियोंने अव्यक्त भगवान् विष्णुसे यह वचन कहा- ॥ ३०-३१॥हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे नारायण! हे जगन्मय ।
हम पूछनेवालोंको आप ठीक-ठीक बतलायें कि विशाल नेत्रोंवाली यह देवी कौन है ?॥ ३२॥
उस समय उन देवताओं तथा महर्पियोंका वह वाक्य सुनकर दानवोंका मर्दन करनेवाले भगवान् विष्णु देवी लक्ष्मीकी ओर देखकर नारद आदि परम पवित्र महर्षियोंसे बोले-। ३३ ॥
यह मेरी स्वरूपभूता ब्रह्मरूपिणी परम शक्ति है, यही माया है, यही अनन्ता है और यही मेरी बह प्रिया है जिसने इस सम्पूर्ण जगतको मोहित कर रखा है।
यह मेरी स्वरूपभूता ब्रह्मरूपिणी परम शक्ति है, यही माया है, यही अनन्ता है और यही मेरी वह प्रिया है जिसने इस सम्पूर्ण जगत्को मोहित कर रखा है हे श्रेष्ठ द्विजो!
इसीके द्वारा मैं देवताओं, असुरों एवं मनुष्योंसे युक्त सम्पूर्ण विश्वको मोहित करता हूँ, संहार करता हूँ और पुनः सृष्टि करता हूँ।
(ज्ञानीजन जगत्की) उत्पत्ति एवं प्रलयको तथा प्राणियोंके जन्म एवं मोक्षको ठीक ठीक समझकर और आत्मतत्त्वका दर्शनकर इस महा मायाके बन्धनसे पार उतरते हैं। द्विजो!
मेरी सब प्रकारकी शक्ति यही है, इसीके अंशोंका आश्रय ग्रहणकर ब्रह्मा तथा शिव आदि देवता शक्तिमान् हुए हैं॥ ३४- ३७ ॥
यही वह सत्त्व-रज तथा तम-तीनों गुणों से युक्त त्रिगुणात्मिका प्रकृति है और यही सारे संसारको उत्पन्न करनेवाली है। प्राचीन कालमें श्रीकल्पमें यह पद्मवासिनीके रूप में मुझसे ही आविर्भूत हुई थी।
ये चार भुजा वाली हैं, ये हाथोंमें शंख, चक्र तथा कमल धारण किये रहती हैं, सभी मङ्गलमय गुणों से युक्त हैं, करोड़ों सूर्योके समान इनकी आभा है, ये सभी प्राणियोंको मोहित करनेवाली हैं।
(बदरिकाश्रममें निवास करनेवाले ऋषि) नारायण, नरोंमें उत्तम श्रीनर तथा उनकी लीला प्रकट करनेवाली भगवती सरस्वतीको नमस्कार कर जय (पुराण एवं इतिहास आदि सद्ग्रन्थों) का पाठ करना चाहिये।
कूर्मरूप धारण करनेवाले अप्रमेय भगवान् विष्णुको नमस्कार कर मैं उस पुराण (कूर्मपुराण) को कहूँगा, जो समस्त विश्वके मूल कारण भगवान् विष्णुके द्वारा कहा गया था ॥ १ ॥
नैमिषारण्यवासी महर्षियोंने (बारह वर्पतक चलनेवाले) सत्र (यज्ञ) के पूर्ण हो जानेपर सर्वथा निष्पाप रोमहर्षण सूतजीसे पवित्र पुराण-संहिताके विषयमें प्रश्न किया महाबुद्धिमान् सूतजी महाराज!
आपने इतिहास और पुराणोंके ज्ञानके लिये ब्रह्मज्ञानियोंमें परम श्रेष्ठ भगवान् वेदव्यासजीकी भलीभाँति उपासना की है। चूँकि आपके वचनसे द्वैपायन भगवान् वेदव्यासजीके समस्त रोम हर्षित हो गये थे, इसलिये आप रोमहर्षण’ कहलाते हैं॥२-४॥
लेखक | Gita Press |
भाषा | हिन्दी |
कुल पृष्ठ | 501 |
Pdf साइज़ | 37.2 MB |
Category | धार्मिक(Religious) |
कूर्म पुराण – Kurma Puran Book/Pustak PDF Free Download